महाशिवरात्रि 2020 : जाने भगवान शिव के प्रतीकों का रहस्य

पौराणिक कहानियों में कहा जाता है कि त्रिमूर्ति यानि ब्रम्हा, विष्णु और महेश ने इस सृष्टि की निर्मिति की हैं. भगवान शिव को सृष्टि का संहारकर्ता भी कहा जाता हैं. भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है.

पौराणिक कहानियों में कहा जाता है कि त्रिमूर्ति यानि ब्रम्हा, विष्णु और महेश ने इस सृष्टि की निर्मिति की हैं. भगवान शिव को सृष्टि का संहारकर्ता भी कहा जाता हैं. भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है. जिसमे महेश, रूद्र, नीलकंठ, भोलेनाथ, गंगाधर जैसे नाम शामिल है.  शिव को अन्य देवताओं से ज्यादा महत्व दिया जाता है. इसलिए उन्हें महादेव कहते है.

भगवान शिव की वेशभूषा अन्य देवताओं से काफी अलग है. बाकि देवता अपनी वेशभूषा में मुकुट, आभूषण, अलग-अलग वस्त्र परिधान करते है. लेकिन भगवान शिव अपने शरीर को भस्म लगाए रहते हैं. इनकी जटाओं में आधा चंद्र, गले में सर्प और मस्तक पर तीसरी आँख हैं. यही भगवान शिव के प्रतिक है. इन सभी प्रतीकों के पीछे एक रहस्यमय कहानी छुपी हैं. इस महाशिवरात्रि पर जानिए भगवान शिव के प्रतीकों की रहस्यमय कहानी.

चंद्रमा : चंद्रमा मन का कारक हैं. योग, ध्यान और साधना करने के लिए मन का शांत रहना आवश्यक हैं. इसलिए भगवान शंकर मन को साधना में एकाग्र रखने के लिए चंद्रमा को धारण किये हुए हैं. बता दें की भगवान शंकर ही ऐसे एकमात्र देवता है जो कैलाश पर्वत पर ध्यान में बैठे रहते थे और वही इस ब्रम्हांड के सबसे बड़े तपस्वी हैं.

त्रिशूल : भगवान शिव का यह मुख्य अस्त्र हैं. इस त्रिशूल में तीन प्रकार की शक्तियां हैं सत, रज और तम. ऐसा कहा जाता है कि शिव के इस अस्त्र के सामने कोई भी टिक नहीं पाता है.

जटा : भगवान शिव की जटा आकाश की तरह है जो वायुमंडल का प्रतिक हैं. भगवान शिव को अंतरिक्ष का देवता कहा जाता है.

त्रिपुंड तिलक : त्रिपुंड सफ़ेद चंदन का भस्म है जो भगवान शिव के मस्तक पर हमेशा लगा रहता है. यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक है. जो त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक माना जाता है.

डमरू : मान्यता के अनुसार अंतरिक्ष में भगवान शिव से पहले किसी को नाचना गाना नहीं आता था. इसलिए शिव को संगीत का जनक भी कहा जाता हैं. डमरू भगवान शिव का सबसे प्रिय वाद्य हैं. भगवान शिव दो तरह के नृत्य करते हैं. एक है नाद और दूसरा ‘ध्वनि’ जो ब्रम्हांड में निरंतर जारी है. इसे ‘ॐ’ कहा जाता है.

गंगा : भगवान शिव की जटा में पूरी गंगा समाहित है. पौराणिक कहानी के अनुसार जब गंगा मां को धरती पर लाने की कोशिश की जा रही थी तब सवाल उठा की गंगा के इस तीव्र वेग को धरती कैसे संभाल पायेगी. अगर गंगा ऐसे ही धरती पर आई तो भूचाल आ सकता था. इसलिए भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समा लिया। तभी गंगा का धरती पर आना संभव हुआ था.

तीसरी आंख – शिव को त्रिलोचन भी कहा जाता है. इसका अर्थ है तीन आँखों वाला। भगवान शंकर ऐसे एकमात्र देवता है जिन्हे तीन आंखे है. कहा जाता है कि शिव की तीसरी आंख खुलने के बाद प्रलय आता है.

भस्म – भस्म मोह और आकर्षण से मुक्ति पाने का प्रतिक है. इसलिए भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म लगाते है. साथ ही इसका उपयोग पूजा में भी किया जाता है.

सर्प : भगवान शिव के गले में हमेशा सर्प रहता है. समुद्र मंथन से निकले विष को शिव ने कंठ में रखा था और उस विकार की अग्नि को दूर के लिए भगवान शिव ने सर्पमाला पहनी है.

बाघ की खाल :  भगवान शंकर हमेशा अपने शरीर पर हाथी और शेर का चर्म धारण करते हैं. हाथी अभिमान का तो शेर हिंसा का प्रतिक है. इसीलिए भगवान शिव ने अहंकार और हिंसा को दबा रखा हैं.