कृष्ण भगवान (Photo Credits-Twitter)
कृष्ण भगवान (Photo Credits-Twitter)

    सीमा कुमारी

    धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी वृन्दावन, जो उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में है, यहां एक निधिवन (Nidhivan) है। जो आज लोगों के लिए अत्यन्त रहस्यमयी बना हुआ है। मान्यता यह है कि निधिवन में आज भी भगवान श्रीकृष्ण  आते हैं और 16 हजार गोपियों के साथ रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद के रूप में मक्खन, मिश्री प्रतिदिन रखा जाता है। कहते हैं, भगवान श्रीकृष्ण के लिए शयन पलंग सजाया जाता है। सुबह बिस्तरों को देखने से ऐसा लगता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है।

    लगभग दो-ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं। इस अद्भुत वन के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहां रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते हैं, जिसकी मधुर ध्वनि सुनी जा सकती है। श्री राधारानी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि को भी सुना जा सकता है। आस्था के प्रतीक निधिवन में एक रंग महल भी स्थापित है।

    निधिवन में 16 हजार वृक्ष हैं जो आपस में गुंथे हुए हैं। मान्यता है कि यही रात में भगवान श्रीकृष्ण की 16 हजार रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।

    इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो 16000 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंगमहल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है, जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो। 

    वास्तु गुरू कहते हैं कि, सच तो यह है, कि निधिवन का वास्तु ही कुछ ऐसा है, जिसके कारण यह स्थान रहस्यमय-सा लगता है। और, इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने स्वार्थ के खातिर इस भ्रम तथा छल को फैलाने में वहां के पंडे-पुजारी और गाईड लगे हुए हैं, जबकि सच इस प्रकार है-

    अनियमित आकार के निधिवन के चारों तरफ पक्की चारदीवारी है। परिसर का मख्यद्वार पश्चिम दिशा में है। परिसर का नऋत्य कोण बढ़ा हुआ है और पूर्व दिशा तथा पूर्व ईशान कोण दबा हुआ है। गाइड, जो 16000 वृक्ष होने की बात करते हैं वह भी पूरी तरह झूठ है क्योंकि परिसर का आकार इतना छोटा है कि 1600 वृक्ष भी मुश्किल से होंगे और छतरी की तरह फैलाव लिए हुए कम ऊंचाई के वृक्षों की शाखाएं इतनी मोटी एवं एवं मजबूत भी नहीं है कि दिन में दिखाई देने वाले बंदर रात्रि में इन पर विश्राम कर सकें। इसी कारण वह रात्रि को यहां से चले जाते हैं।

    इस परिसर की चारदीवारी लगभग 10 फीट ऊंची है और बाहर के चारों ओर रिहायशी इलाका है, जहां चारों ओर दो-दो, तीन-तीन मंजिला ऊंचे मकान बने हुए हैं। इन घरों से निधिवन की चारदीवार के अन्दर के भाग को साफ-साफ देखा जा सकता है। वह स्थान जहां रात्रि के समय रासलीला होना बताया जाता है, वह निधिवन के मध्य भाग से थोड़ा दक्षिण दिशा की ओर खुले में स्थित है। यदि सच में रासलीला देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा हो जाए या मर जाए, तो ऐसी स्थिति में निश्चित ही आस-पास के रहने वाले यह इलाका छोड़कर चले गए होते । 

    निधिवन के अन्दर जो 15-20 समाधियां बनी हैं , वह स्वामी हरिदास जी और अन्य आचार्यों की समाधियां हैं, जिन पर उन आचार्यों के नाम और मृत्यु तिथि के शिलालेख लगे हैं। इसका उल्लेख निधिवन में लगे उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के शिलालेख पर भी किया गया है। इन्हीं समाधियों की आड़ में ही गाइड यह भम्र फैलाते हैं कि जो रासलीला देख लेता है, वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाता है और यह सभी उन्हीं की समाधियां हैं।

    रंगमहल के अन्दर जो दातून गीली और सामान बिखरा हुआ मिलता है। यह भ्रम इस कारण फैला हुआ है कि रंग महल के नैऋत्य कोण में रंग महल के अनुपात में बड़े आकार का ‘ललित कुण्ड’ है जिसे ‘विशाखा कुण्ड’ भी कहते हैं।

    जिस स्थान पर नैऋत्य कोण में यह स्थिति होती है, वहां इस प्रकार का भ्रम और छल आसानी से निर्मित हो जाता है। यहां जो वृक्ष आपस में गुंथे हुए हैं इसी प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में सेवाकुंज एवं यमुना के तटीय स्थानों पर भी देखने को मिलते हैं।