शक्तिपीठों में लगने लगी भक्तों की कतार, इन रूपों के दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु

हिंदू मान्यता के अनुसार, देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में 26, शिवचरित्र में 51, दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है। वहीं ऐसा भी माना जाता है कि जब सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। तब शिवजी अपनी पत्नी सती का जला हुआ अंग लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां-जहां माता के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए। तो आइये आज हम आपको बताते हैं 51 शक्तिपीठों में 10 शक्तिपीठों के बारे में…

कांची शक्तिपीठ:

यह शक्तिपीठ तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम नगर में स्थित है। यहाँ देवी का कंकाल गिरा था। शक्ति ‘देवगर्भा’ तथा भैरव ‘रुरु’ हैं। यहाँ देवी कामाक्षी का भव्य विशाल मंदिर है, जिसमें त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमूर्ति कामाक्षी देवी की प्रतिमा है। यह दक्षिण भारत का सर्वप्रधान शक्तिपीठ है। काँची के तीन भाग हैं- शिवकाँची, विष्णुकाँची, जैनकाँची। ये तीनों अलग नहीं हैं। शिवकाँची नगर का बड़ा भाग है, जो स्टेशन से लगभग-2 किलोमीटर है।

कामाक्षी देवी को ‘कामकोटि’ भी कहा जाता है तथा मान्यता है कि यह मंदिर शंकराचार्य द्वारा निर्मित है। देवी कामाक्षी के नेत्र इतने कमनीय या सुंदर हैं कि उन्हें कामाक्षी संज्ञा दी गई। वस्तुतः कामाक्षी में मात्र कमनीय या काम्यता ही नहीं, वरन् कुछ बीजाक्षरों का यांत्रिक महत्त्व भी है। ‘क’ कार ब्रह्मा का, ‘अ’ कार विष्णु का, ‘म’ कार महेश्वर का वाचक है। इसीलिए कामाक्षी के तीन नेत्र त्रिदेवों के प्रतिरूप हैं। सूर्य-चंद्र उनके प्रधान नेत्र हैं, अग्नि उनके भाल पर चिन्मय ज्योति से प्रज्ज्वलित तृतीय नेत्र है। कामाक्षी में एक और सामंजस्य है ‘का’ सरस्वती का। ‘माँ’ महालक्ष्मी का द्योतक है। इस प्रकार कामाक्षी के नाम में सरस्वती तथा लक्ष्मी का युगल-भाव समाहित है। शंकराचार्य ने-

सुधा सिन्धोर्मध्ये सुर विरटिवाटी परिवृत्तं मणिद्वीपे नीपोपपवनवति चिंतामणि गृहे। 
शिवाकारे मंचे पर्यंक निलयां भजंति त्वां धन्याः कतिचन चिदानंद लहराम्॥

कहते हुए उन्हें सुधा सागर के बीच पारिजात वन में मणिद्वीप वासिनी शिवाकार शैय्या पर परम शिव के साथ परमानंद की अनुभूति करने वाली कहा है।

कामाक्षी देवी त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमूर्ति हैं। एकाम्रेश्वर मंदिर के गर्भगृह में कामाक्षी की सुंदर प्रतिमा है। परिसर में ही अन्नपूर्णा तथा शारदा के भी मंदिर हैं। एक स्थान पर शंकराचार्य की भी मूर्ति है। मंदिर के द्वार पर कामकोटि यंत्र में ‘आद्यालक्ष्मी’, ‘विशालाक्षी’, ‘संतानलक्ष्मी’, ‘सौभाग्यलक्ष्मी’, ‘धनलक्ष्मी’, ‘वीर्यलक्ष्मी’, ‘विजयलक्ष्मी’, ‘धान्यलक्ष्मी’ का न्यास किया गया है तथा परिसर में एक सरोवर है। मंदिर के द्वार पर श्री रूपलक्ष्मी सहित चोर महाविष्णु तथा मंदिर के अधिदेवता श्री महाशास्ता के विग्रह हैं, जिनकी संख्या 100 के लगभग है। मंदिर का मुख्य विमान स्वर्णपत्रों से जड़ा हुआ है। निवास हेतु काँची में अनेक धर्मशालाएँ, लाज, होटल आदि मौजूद हैं। काँची, चेन्नई से 75 किलोमीटर दूर है। यहाँ का नजदीकी विमान स्थान चेन्नई है। ‘काँची’, चेन्नई, तिरुपति, बैंगलूर से सीधे रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है तथा सड़क मार्ग से भी जुड़ा है।

कालमाधव शक्तिपीठ:

कालमाधव शक्तिपीठ अमरकंटक, मध्यप्रदेश के पास पहाड़ियों पर एक गुफा में जो की श्रोण नदी के तट पर मंदिर स्.थापित है । यह जगह चित्रकूट के बहुत करीब है ।यह स्थान नर्मदा नदी का उद्भव स्थान है । यहां देवी सती का वाम नितमब /कूल्हा यहां गिरा था । मूर्तियों अस्थनन्दा (असितांग) के रूप में काली और शिव के रूप में देवी हैं कि कहा जाता है कि देवी की प्रार्थना करके दरियादिली से अपने वांछित मनोकानाएं पूरी की जा सकती हैं ।

इस शक्तिपीठ के निश्चित स्थान के बारे में संशय व्यक्त किया गया है और ज़्यादातर विद्वान् इसे अज्ञात ही स्वीकार करते हैं। यहाँ माता का बायाँ नितंब गिरा था। यहाँ की सति ‘काली’ तथा शिव ‘असितांग’ हैं। तंत्र चूड़ामणि’ से मात्र नितम्ब निपात का एवं शक्ति तथा भैरव का पता लगता है- ‘नितम्ब काल माधवे भैरवश्चसितांगश्च देवी काली सुसिद्धिदा।’ 

हालांकि ज़्यादातर विद्वान इसका स्थान नहीं तय कर पायें हैं. लेकिन बहुत से विद्वान इसे मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव मानते हैं। अमरकंटक  नर्मदा नदी, सोन नदी और जोहिला नदी का उदगम स्थान है। यह हिंदुओं का पवित्र स्थल है। मैकाल की पहाडि़यों में स्थित अमरकंटक मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले का लोकप्रिय हिन्‍दू तीर्थस्‍थल है। 

समुद्र तल से 1065 मीटर ऊंचे इस स्‍थान पर ही मध्‍य भारत के विंध्य और सतपुड़ा की पहाड़ियों का मेल होता है। चारों ओर से टीक और महुआ के पेड़ो से घिरे अमरकंटक से ही नर्मदा और सोन नदी की उत्‍पत्ति होती है। नर्मदा नदी यहां से पश्चिम की तरफ और सोन नदी पूर्व दिशा में बहती है। यहाँ का दृश्य चित्रकूट से मिलता-जुलता है। यह मंदिर सफ़ेद पत्थरों का बना है और इसके चारो ओर तालाब है। यहाँ पर सोन नदी का नज़ारा बहुत अच्छा है। माना जाता है कि सूर्यवंशी सम्राट मान्धाता ने अमरकंटक की स्थापना 6000 साल पहले की थी।

शोणाक्षी शक्तिपीठ:

मध्य प्रदेश के अमरकण्टक के नर्मदा मंदिर में सती के “दक्षिणी नितम्ब का निपात” हुआ था और वहाँ के इसी मंदिर को शक्तिपीठ कहा जाता है। यहाँ माता सती “नर्मदा” या “शोणाक्षी” और भगवान शिव “भद्रसेन” कहलाते है। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मंदिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है।

यहाँ सती का “दायाँ नेत्र गिरा” था, ऐसा मानते हैं। यद्यपि अब शोण नदी कुछ दूर अलग चली गई है। कुछ विद्वान डेहरी-आनसोन स्टेशन जो दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेलमार्ग पर स्थित है, से कुछ दूर पर स्थित देवी मंदिर को शक्तिपीठ मानते हुए इसे ही शोण शक्तिपीठ कहते हैं। इसकी स्थिति को लेकर मतांतर है।

शिवानी शक्तिपीठ:

उत्तरप्रदेश के झांसी-मणिकपुर रेलवे स्टेशन चित्रकूट के पास रामगिरि स्थान पर माता का दायां वक्ष गिरा था। इसकी शक्ति है शिवानी और भैरव को चंड कहते हैं। हालांकि कुछ लोग मैहर (मध्य प्रदेश) के शारदा देवी मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं। चित्रकूट में भी शारदा मंदिर है। रामगिरि पर्वत चित्रकूट में है। चित्रकूट हजरत निजामुद्दीन-जबलपुर रेलवे लाइन पर स्थित है।

स्टेशन का नाम ‘चित्रकूटधाम कर्वी’ है। यह लखनऊ से 285 कि.मी., हजरत निजामुद्दीन से 670 कि.मी. दूर है। मानिकपुर स्टेशन से 30 कि.मी. पहले चित्रकूटधाम कर्वी है। पर्यटन की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण तथा बरसात में दर्शनीय चित्रकूट प्रख्यात तीर्थ है।

कात्यायनी शक्ति:

श्री कात्यायनी शक्ति पीठ भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। महर्षि वेदव्यास ने श्री कात्यायनी शक्तिपीठ के बारे में श्रीमद भागवत में भी वर्णन किया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जिस स्थान पर कात्यायनी शक्ति पीठ है वहां माता सती के केश गिरे थे। किवदंती यह है कि भगवान श्रीकृष्ण को अपने वर रूप में प्राप्त करने के लिए राधारानी ने भी कात्यायनी माता की पूजा की थी।

कात्यायनी शक्ति पीठ उत्तर प्रदेश के मथुरा के वृन्दावन में स्थित है। यह एक बहुत ही प्राचीन सिद्ध पीठ है जो वृन्दावन में राधाबाग के पास है। सालों भर यहां भक्त दर्शन और पूजा करने के लिए आते हैं। नवरात्र के दिनों में कात्यानी शक्ति पीठ में भक्तों की काफी भीड़ होती है। गुरु मंदिर, शंकराचार्य मंदिर, शिव मंदिर तथा सरस्वती मंदिर भी कात्यायनी मंदिर के पास ही हैं। ये बहुत प्रसिद्ध मंदिर हैं जहां लोग काफी संख्या में पूजा करने आते हैं।

कात्यायानी शक्तिपीठ वृन्दावन में स्थित है। वृन्दावन मथुरा से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। रेल मार्ग से यात्रा करने वाले यात्री मथुरा उतरकर वृन्दावन पहुंच सकते हैं। गाड़ी से यात्रा करने वाले यात्री सीधे वृन्दावन पहुंच सकते हैं। गाड़ी भक्तजन को मंदिर से करीब 200 मीटर पहले उतारती है। हवाई यात्रा करने वाले लोगों को पहले दिल्ली पहुंचना होगा। दिल्ली से मथुरा ट्रेन से पहुंच सकते हैं। आगरा में भी एयरपोर्ट है जहां भक्तजन पहुंच सकते हैं।

शुचींद्रम शक्तिपीठ:

तमिलनाडु में कन्याकुमारी के ‘त्रिसागर’ संगम स्थल से 13 किलोमीटर की दूरी पर शुचींद्रम में स्थित स्थाणु-शिव के मंदिर में ही शुचि शक्तिपीठ स्थापित है। यहाँ सती के ‘ऊर्ध्वदंत’ गिरे थे। यहाँ की शक्ति ‘नारायणी’ तथा भैरव ‘संहार या ‘संकूर’ हैं। मान्यता है कि यहाँ देवी अब तक तपस्यारत हैं। शुचींद्रम क्षेत्र को ज्ञानवनम् क्षेत्र भी कहते हैं। महर्षि गौतम के शाप से इंद्र को यहीं मुक्ति मिली थी, वह शुचिता (पवित्रता) को प्राप्त हुए, इसीलिए इसका नाम शुचींद्रम पड़ा।

पौराणिक आख्यान है कि बाणासुर ने घोर तपस्या करके शिव से अमरत्व का वरदान माँगा। शिव ने कहा कि वह कुमारी कन्या के अतिरिक्त सभी के लिए अजेय होगा। वर पाकर वह उत्पाती हो गया तथा देवताओं को भी परास्त कर डाला, जिसके देवलोक में भी त्राहि-त्राहि मच गई। इस पर देवगण विष्णु की शरण में गए और उनके परामर्श पर महायज्ञ किया, जिससे भगवती दुर्गा एक अंश से कन्या रूप में प्रकटीं। देवी ने शिव को पति रूप में पाने हेतु दक्षिण समुद्र तट पर तप किया और शिव ने उन्हें वांछित वर दिया। इस पर देवताओं को चिंता हुई कि यदि कन्या का शिव से विवाह हो गया, तो बाणासुर का वध कैसे होगा? अतः नारद ने शिव को शुचींद्रम तीर्थ में प्रपंच में उलझा दिया, जिससे विवाह मुहूर्त निकल गया। इससे शिव वहाँ पर स्थाणु रूप में स्थित हो गए। देवी ने पुनः तप प्रारंभ किया और मान्यता है कि वह अब तक कन्यारूप में तपस्यारत हैं। इधर अपने दूतों से देवी के सौंदर्य की चर्चा सुन बाणासुर ने उसने विवाह का प्रस्ताव किया, तब उसका देवी से युद्ध हुआ और अंततः बाणासुर का वध देवी के हाथों हो गया।

इस शक्तिपीठ में माता सती शक्ति नारायणी रूप में, जबकि भगवान भोलेनाथ संहार भैरव के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवती देवी ने महाराक्षस बाणासुर का वध किया था और यहीं पर देवराज इन्द्र को महर्षि गौतम के शाप से मुक्ति मिली थी। यहां के मंदिर में नारायणी माँ की भव्य एवं भावोत्पादक प्रतिमा है और उनके हाथ में एक माला है। निज मंदिर में भद्रकाली जी का मंदिर भी है। ये भगवती देवी की सखी मानी जाती हैं।

माता के इस शक्तिपीठ में पूजा-उपासना का एक अलग महत्व है। आस्थावान भक्तों के अनुसार यहां उपासना करने से वैदिक और अन्य मंत्र सिद्ध होते हैं। नवरात्र, चैत्र पूर्णिमा, आषाढ़ एवं आश्विन अमावस्या, शिवरात्रि आदि विशेष सुअवसरों पर यहां विशेष उत्सव होते हैं, जिसमें देवी माँ का हीरों से श्रृंगार किया जाता है। कन्याकुमारी में स्नान करने से भक्तों के सारे पाप मिट जाते हैं और वे पवित्र हो जाते हैं।

वाराही शक्तिपीठ: 

पंचसागर (अज्ञात स्थान) में माता की निचले दंत (अधोदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है वराही और भैरव को महारुद्र कहते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह स्थान वाराणसी पंच सागर क्षेत्र में है, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भी एक मंदिर है, जिसका नाम दंतेश्वरी मंदिर है। यहां के लोगों का मानना है कि इस मंदिर के स्थान पर ही सती मां के दन्त गिरे थे। इसी के चलते यह मंदिर एक शक्तिपीठ है। तीसरा मंदिर उत्तराखंड राज्य के लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर दूर देवीधुरा में है। परंतु अधिकतर मत वाराणसी के समर्थन में ही विद्यमान है।

वाराणसी के पंच सागर मंदिर में माता का वाराही के रूप में पूजा जाता है। हिन्दू धर्म में वाराही माता को तीनों वर्ग में पूजा की जाती है शक्तिस्म (देवी की पूजा की जाती है), शैवीस्म (भगवान शिव की पूजा की जाती है) और वैष्णवीस्म (भगवान विष्णु की पूजा की जाती है)। पुराणों में भी वाराही का वर्णन किया गया है। चौंसठ योगिनियों में 28 वां स्थान माता वाराही का है। यह देवी दुर्गा का तामस और सात्विक रुप हैं, जो भगवान विष्णु के वराहावतार की शक्ति रूपा हैं। इनका शीश जंगली सूकर का है। देवीपुराण के  देवीनिरुक्ताध्याय में कहा गया है- 

वराहरूपधारी च वराहोपम उच्यते । 
वाराहजननी चाथ वाराही वरवाहना ॥

श्रीदुर्गा सप्तशती चंडी के अनुसार शुंभ निशुंभ दो महादैत्यों के साथ जब महाशक्ति भगवती मां दुर्गा का प्रचंड युद्ध हो रहा था तब मां भगवती परमेश्वरी कि सहायता के लिए सभी प्रमुख देवता (भगवान शिव, भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा, देवराज इंद्र, कुमार कार्तिकेय) अपने कर्मों के आधार शक्ति स्वरूपा देवीयों को अपने शरीर से निकालकर देवी दुर्गा के पास प्रेरित किया था। उसी समय भगवान विष्णु अपने अंशावतार वाराह के शक्ति मां वाराही को प्रकट किया था। इनके कई नाम हैं।

भबानीपुर शक्तिपीठ:

भवानीपुर शक्तिपीठ बांग्लादेश के राजशाही डिवीजन के बोगरा जिले में स्थित है। करातोया नदी के किनारे स्थित इस मंदिर को हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है। भवानीपुर में शक्ति की ‘अपर्णा’ और कालभैरव की ‘वामन’ के रूप में उपासना की जाती है। बांग्लादेश में स्थित यह शक्तिपीठ हिंदुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ-स्थल है।

यह मंदिर 12 बीघे के एक अहाते के बीचोबीच बना हुआ है। मंदिर प्रांगण में एक शिव मंदिर और कालभैरव का भी मंदिर स्थित है। मंदिर के उत्तर में सेवा आंगन और शंख पुकुर तालाब है, जिसका निर्माण एक स्थानीय राजघराने ने करवाया था। प्रतिवर्ष इस मंदिर प्रांगण में माघ पूर्णिमा, रामनवमी और दशहरे के अवसर पर मेला लगता है।

तीर्थयात्री ढाका से भवानीपुर जाने के लिए यमुना पुल का मार्ग चुन सकते हैं। इस मार्ग में सिराजगंज जिले में चंदाईकोना पार करने के बाद घोगा बो़ट टोला पहुंचकर हाइवे के किनारे वैन या कोई अन्य सवारी लेकर भवानीपुर मंदिर पहुंचा जा सकता है। बोगरा से उत्तर दिशा से आने वाले श्रद्धालु शेरपुर, मिर्जापुर से हेकर घोगा बो़ट टोला बस स्टैंड तक पहुंच सकते हैं।

इस मंदिर की देखरेख मंदिर प्रबंध समिति द्वारा किया जाता है। आजादी से पूर्व बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के रूप में पाकिस्तान का एक हिस्सा था। उस दौर में शत्रु-सम्पत्ति अधिनियम की आड़ में इस शक्तिपीठ की भूमि पर लगातार अतिक्रमण हुए। लेकिन बाद में बांग्लादेश के हिंदु श्रद्धालुओं के प्रयास से अब इस मंदिर के संरक्षण का कार्य चल रहा है।

त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ:

त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है। ‘धालाई’, ‘उत्तरी त्रिपुरा’, ‘दक्षिणी त्रिपुरा’ और ‘पश्चिमी त्रिपुरा’ वाला भारत का अति लघु प्रदेश त्रिपुरा बांग्लादेश से घिरा है। पूर्वोत्तर में एक सँकरी पट्टी है, जहाँ त्रिपुरा की सीमा असम तथा मिज़ोरम से मिलती है। इन चार ज़िलों के मुख्यालय हैं- धालाई का मुख्यालय ‘अम्बासा’, उत्तरी त्रिपुरा का मुख्यालय ‘कैलास शहर’, दक्षिणी त्रिपुरा का मुख्यालय ‘उदयपुर’ और पश्चिमी त्रिपुरा का मुख्यालय ‘अगरतला’, जो त्रिपुरा राज्य की राजधानी भी है। त्रिपुरा का क्षेत्रफल मात्र 10491 वर्ग किलोमीटर है। इसकी पुरानी राजधानी उदयपुर ही थी।

उल्लेखनीय है कि महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियाँ हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। देवी त्रिपुरसुंदरी ब्रह्मस्वरूपा हैं, भुवनेश्वरी विश्वमोहिनी हैं। वही परदेवता, महाविद्या, त्रिपुरसुंदरी, ललिताम्बा आदि अनेक नामों से स्मरण की जाती हैं। त्रिपुरसुंदरी का शक्ति-संप्रदाय में असाधारण महत्त्व है। इन्हीं के नाम पर सीमांत प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर भाग में ‘त्रिपुरा राज्य’ नाम से स्थापित है। कुछ का यह कथन है कि त्रिपुरी भाषा के दो शब्द ‘तुर्ड’ तथा ‘प्रा’ पर इस राज्य का नाम पड़ा है, जिसका संयुक्त रूप से अर्थ होता है- ‘पानी के पास।’ दक्षिणी-त्रिपुरा उदयपुर शहर से तीन किलोमीटर दूर, राधा किशोर ग्राम में राज-राजेश्वरी त्रिपुर सुन्दरी का भव्य मंदिर स्थित है, जो उदयपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम में पड़ता है। यहाँ सती के दक्षिण ‘पाद’ का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति ‘त्रिपुर सुंदरी’ तथा शिव ‘त्रिपुरेश’ हैं। इस पीठ स्थान को ‘कूर्भपीठ’ भी कहते हैं। इस मंदिर का प्रांगण कूर्म की तरह है तथा इस मंदिर में लाल-काली कास्टिक पत्थर की बनी माँ महाकाली की भी मूर्ति है। इसके अतिरिक्त आधा मीटर ऊँची एक छोटी मूर्ति भी है, जिसे माता कहते हैं। उनकी भी महिमा माँ काली की तरह है। कहते हैं कि त्रिपुरा-नरेश शिकार हेतु या युद्ध पर प्रस्थान करते समय इन्हें अपने साथ रखते थे।

उदयपुर-सबरम पक्की सड़क के किनारे स्थापित इस शक्तिपीठ के मंदिर का क्षेत्रफल 24x24x75 फुट है। उदयपुर से माताबाड़ी के लिए बस, टैक्सी, ऑटोरिक्शा उपलब्ध हैं तथा मंदिर के निकट अनेक धर्मशालाएँ एवं रेस्ट हाउस भी बने हुए हैं। दक्षिणी त्रिपुरा की प्राचीन राजधानी उदयपुर शहर से 3 किलोमीटर दूर त्रिपुर सुंदरी मंदिर है। वहाँ जाने के लिए अगरतला तक वायुयान से यात्रा करनी होगी। वहाँ से सड़क मार्ग ही मुख्य यातायात साधन है। यहाँ रेलमार्ग मात्र 64 किलोमीटर तक उपलब्ध है। कोलकाता से लामडिंग, वहाँ से सिलचर जाकर वायुमार्ग से यात्रा करना सुविधाजनक है। यद्यपि सड़क मार्ग भी उपलब्ध है, पर अधिक सुविधाजनक नहीं है।

चंद्रभागा शक्तिपीठ:

गुजरात के प्रभास क्षेत्र में त्रिवेणी संगम के निकट माँ सती के ५२ शक्तिपीठों में से एक चंद्रभागा शक्ति पीठ का वर्णन पुराणों में भी उल्लेखित किया गया है। कपिला, हिरण्या एवं सरस्वती नदी के त्रिवेणी संगम पर शमशान भूमि के निकट सोमनाथ ज्योतिरलिंग के समीप है माँ सती के शरीर का अंग उदर/आमाशय देवी चंद्रभागा के रूप में जाना जाता है, देवी के इस रूप के रक्षण हेतु वक्रतुंड भैरव हमेसा से उनके निकट विराजमान हैं।

वर्तमान समय में यह शक्तिपीठ सोमनाथ ट्रस्ट के श्री राम मंदिर के पिछले हिस्से के ओर व हरिहर वन के निकट स्थित है। मंदिर की ओर जाने का रास्ता श्री राम मंदिर के प्रवेश द्वार के बाएं तरफ से जाता है। सोमनाथ क्षेत्र में इस शक्तिपीठ के वारे में जानकारी का काफी अभाव है। ज्यादातर गाइड इस मंदिर को वहाँ के लोकल धार्मिक घूमने वाले मंदिरों में शामिल नहीं करते हैं। अतः भक्तों को खुद से ही, माँ सती के इस रूप के दर्शन हेतु प्रयाशरत रहना होगा।