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    -सीमा कुमारी

    हिन्दू धर्म में ‘एकादशी व्रत’ का बड़ा महत्व है। ‘एकादशी व्रत’’ महीने में दो बार रखा जाता है। एक कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष में। हिन्दू धर्म में ‘एकादशी व्रत’ विशेष महत्व रखता है। इस साल  निर्जला एकादशी का व्रत ( Nirjala Ekadashi ) 21 जून, यानी अगले सोमवार को है। हिन्दू पंचांग के अनुसार,   ‘एकादशी व्रत’ हर साल जेठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। ‘निर्जला एकादशी’ व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, क्योंकि इस व्रत में अन्न और जल का त्याग किया जाता है। जल की एक बूंद भी इस व्रत में ग्रहण नहीं की जाती है। बिना जल ग्रहण किए ही इस व्रत को करना होता है। इसलिए इस एकादशी तिथि को ‘निर्जला एकादशी’ कहा जाता है। यह व्रत अत्यंत कठिन होने के कारण सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता  है।

    शास्त्रों के अनुसार, ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत करने से साल की सभी एकादशियों का फल मिलता है। आइए जानें एकादशी व्रत का महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि:

    शुभ मुहूर्त:

    ‘निर्जला एकादशी’ तिथि:

    21 जून 2021

    एकादशी तिथि प्रारंभ:

    20 जून, रविवार को शाम 4 बजकर 21 मिनट से शुरू

    एकादशी तिथि समापन:

    21 जून, सोमवार को दोपहर 1 बजकर 31 मिनट तक

    एकादशी व्रत का पारण समय: 22 जून, सोमवार को सुबह 5 बजकर 13 मिनट से 8 बजकर 1 मिनट तक

    पूजा विधि-

    मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं और हाथ में गंगाजल लेकर व्रत का संकल्प करें। यह दिन विष्णु जी का होता है इसलिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ रहता है। स्नान करने के पश्चात सर्वप्रथम सूर्य देव को जल अर्पित करें।

    अब भगवान विष्णु के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप जलाकर दिखाएं।

    अब पीले पुष्प, फल, अक्षत, दूर्वा और चंदन आदि से भगवान विष्णु का पूजा करें। 

    तुलसी विष्णु जी को अति प्रिया है इसलिए पूजन में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। 

    भगवान विष्णु के समक्ष ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।

    इसके बाद एकादशी व्रत का महात्म्य पढ़ें और आरती करें।

    पूरे दिन निर्जला उपवास करने और रात्रि में जागरण कर भजन कीर्तन करने का विधान है।

    द्वादशी तिथि यानी दूसरे दिन प्रातः जल्दी घर की साफ-सफाई करें और स्नानादि करके भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें भोग लगाएं। इसके बाद किसी जरुरतमंद या ब्राह्मण को भोजन कराएं एवं शुभ मुहूर्त में स्वयं भी व्रत का पारण करें।

    ‘निर्जला एकादशी’ व्रत का महत्व-

    सनातन हिन्दू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। ‘एकादशी व्रत’ भगवान विष्णु को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार,इस व्रत को नियमपूर्वक करने से व्यक्ति के न केवल वर्ष भर की सभी एकादशी के व्रत का फल मिलता है, बल्कि विष्णु लोक की भी प्राप्ति का द्वार खुल जाता है। व्यक्ति के समस्त पाप कर्म निष्फल हो जाते हैं। ‘निर्जला एकादशी’ को ‘भीमसेन एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। ऋषि वेदव्यास ने भीम को इस व्रत का महात्मय बताते हुए कहा था कि यदि तुम सभी एकादशी के व्रत नहीं कर सकते तो ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत करो, इससे तुम्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाएगा। तब वृकोदर भीम भी इस व्रत को करने के लिए सहमत हो गए इसलिए इस व्रत को ‘पांडव एकादशी’ या फिर ‘भीमसेन एकादशी’ भी कहा जाता है। ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत करने से मनुष्य इस लोक में सुख और यश की प्राप्ति करता है एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।