भाग्य और संतान की प्राप्ति का त्यौहार ‘वट सावित्री’, जानें कथा और पूजा विधि

    -सीमा कुमारी

    हिंदू धर्म में’ वट सावित्री का व्रत’ सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। शास्त्रों के अनुसार, ‘वट सावित्री व्रत’ (Vat Savitri Vrat) माता सावित्री को समर्पित है। सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से बचाए थे। इसलिए मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। और भाग्य और संतान की प्राप्ति में सहायता करने वाला व्रत ‘वट सावित्री व्रत’ आदर्श नारीत्व  का प्रतीक भी माना गया है।

    ऐसे में  वट वृक्ष का पूजन और सावित्री सत्यवान की स्मरण के विधान के कारण ही यह ‘वट सावित्री व्रत’ के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ। पंचांग के मुताबिक़, हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इसे ‘वट अमावस्या’ भी कहा जाता है, जो इस साल 10 जून, यानी अगले  गुरुवार को है। आइए जानें ‘वट सावित्री’ का शुभ- मुहूर्त, पूजा विधि और कथा…

    शुभ मुहूर्त:

    • ज्येष्ठ अमावस्या तिथि प्रारंभ- 09 जून 2021 दिन बुधवार को दोपहर 01 बजकर 57 मिनट से
    • ज्येष्ठ अमावस्या तिथि समाप्त-
    • 10 जून 2021 दिन गुरुवार को शाम 04 बजकर 20 मिनट पर
    • व्रत पारण- 11 जून 2021 दिन शुक्रवार

    पौराणिक मान्यता अनुसार, इस दिन वट वृक्ष में रक्षा सूत्र बांधने और पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और डालियों व पत्तों में भगवान शिव का वास होता है। इसके आलावा धार्मिक मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी इस कारण ही अपने पति की दीर्घायु की कामना के साथ रक्षा सूत्र के रूप में वट वृक्ष में सूत बांधा जाता है और पूजा की जाती है। महिलाएं माता सावित्री से अखंड सौभाग्य और संतान प्राप्ति की कामना करती हैं।

    पूजा विधि: 

    मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं और हाथ में गंगाजल लेकर व्रत का संकल्प लें। और सोलह शृंगार करें। और माथे में पीले रंग का सिंदूर लगाना ना  भूलें, क्योंकि पीले रंग के सिंदूर को शुभ माना जाता है।बरगद के पेड़ पर सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति रखें।  फिर पेड़ में जल अर्पित करे और  पुष्प, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं। वृक्ष में रक्षा सूत्र बांधकर आशीर्वाद मांगें। वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें।इसके बाद हाथ में काले चना लेकर इस व्रत का कथा सुनें। कथा सुनने के बाद पंडित जी को दान देना न भूलें। दान में आप वस्त्र, पैसे और चने दें। अगले दिन व्रत को तोड़ने से पहले बरगद के वृक्ष का कोपल खाकर उपवास समाप्त करें।

    ‘वट सावित्री’ की कथा:

    मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा का राज था। उनका कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने यज्ञ करवाया। जिसके शुभ फल से कुछ समय बाद उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई, इस कन्या का नाम सावित्री रखा गया। जब सावित्री विवाह योग्य हुई तो उन्होंने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पतिरूप में वरण किया। सत्यवान के पिता भी राजा थे परंतु उनका राज-पाट छिन गया था, जिसके कारण वे लोग बहुत ही द्ररिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे थे। सत्यवान के माता-पिता की भी आंखों की रोशनी चली गई थी। सत्यवान जंगल से लकड़ी काटकर लाते और उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना गुजारा करते थे।

    जब सावित्री और सत्यवान के विवाह की बात चली तब नारद मुनि ने सावित्री के पिता राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष पश्चात ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। जिसके बाद सावित्री के पिता नें उन्हें समझाने के बहुत प्रयास किए परंतु सावित्री यह सब जानने के बाद भी अपने निर्णय पर अडिग रही। अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। इसके बाद सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा में लग गई।समय बीतता गया और वह दिन भी आ गया जो नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु के लिए बताया था। उसी दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन को गई। वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ने लगा कि उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी, कुछ वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया।

    कुछ ही समय में उनके समक्ष अनेक दूतों के साथ स्वयं यमराज खड़े हुए थे। यमराज सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी। आगे जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, ‘हे पतिव्रता नारी! जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है, तुमने अपने पति का साथ दे दिया। अब तुम लौट जाओ’ इस पर सावित्री ने कहा, “जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए। यही सनातन सत्य है।” यमराज सावित्री की वाणी सुनकर प्रसन्न हुए और उनसे तीन वर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, “मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें।” यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे किंतु सावित्री यम के पीछे ही चलती रही। यमराज ने प्रसन्न होकर पुन: वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर मांगा, “मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए। इस तरह सावित्री ने बचाए अपने पति के प्राण।

    इसके बाद सावित्री ने यमदेव से वर मांगा, “मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें।” सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो सावित्री से ‘तथास्तु’ कहा। जिसके बाद सावित्रीbने कहा, “मेरे पति के प्राण तो आप लेकर जा रहे हैं, तो आपके पुत्र प्राप्ति का वरदान कैसे पूर्ण होगा।” तब यमदेव ने अंतिम वरदान को देते हुए सत्यवान की जीवात्मा को पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री पुनः उसी वट वृक्ष के लौटी तो उन्होंने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हो रहा है। कुछ देर में सत्यवान उठकर बैठ गया। उधर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया।