कब है शनि जयंती? जानें तिथि, मुहूर्त, पूजा-विधि और महिमा

    -सीमा कुमारी

    सनातन हिन्दू धर्म में न्याय के देवता शनिदेव को समर्पित है। शनिदेव को कर्म और न्याय देवता भी कहा जाता है। ऐसा कहते हैं कि, शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर अच्छा और बुरा फल देते हैं। यूं तो शनिदेव (Shani Dev) को प्रसन्न करना बहुत कठिन है। लेकिन, एक बार शनिदेव किसी से प्रसन्न हो जाएं, तो उस व्यक्ति के जीवन की सारी परेशनियां दूर हो जाती हैं।

    ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, शनि की वक्र- दृष्टि के दौरान जातक को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

    हिंदू धर्म में हर साल ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को ‘शनि जयंती’ (Shani Janmotsav) पूरे देश भर में श्रद्धापूर्वक मनाते हैं। इस साल यह तिथि 10 जून, यानी अगले गुरुवार को है। धार्मिक मान्यता है कि ‘ज्येष्ठ अमावस्या’ के दिन शनि देव का जन्म हुआ था। शनिदेव भगवान सूर्य और माता छाया के पुत्र हैं। ‘शनि जयंती’ के दिन शनि महाराज की विधि-विधान से पूजा की जाती है। शनि-दोष की शांति के उपाय के लिए ज्येष्ठ अमावस्या का दिन बेहद ही शुभ दिन होता है। आइए जानें इसका शुभ-मुहर्त और पूजा विधि-

    शुभ मुहूर्त:

    अमावस्या तिथि प्रारम्भ-

    दोपहर 01:57 बजे (जून 09, 2021)

    अमावस्या तिथि समाप्त-

    शाम 04:22 बजे (जून 10, 2021)

    पूजा-विधि:

    मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं और हाथ में गंगाजल लेकर व्रत का संकल्प करें। पूजा स्थल पर शनिदेव की मूर्ति स्थापित करें।

    शनि देव को तेल, फूल, माला आदि चढ़ाएं। 

    इसके बाद तेल का दीपक जलाएं।

    शनि चालीसा का पाठ करें।

    अब आरती करने के बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें।

    अंत में प्रसाद का वितरण करें।

    शनि देव से जुड़ी चीजों का दान करें।

    ‘शनि जयंती’ (Shani Jayanti) का महत्व

    हिन्दू धर्म में शनि जयंती का विशेष महत्व है।शास्त्रों के अनुसार, ‘शनि अमावस्या’ या ‘शनि जयंती’ के दिन शनि देव की पूजा करने से लोगों पर शनि की बुरी दृष्टि नहीं पड़ती है। जो व्यक्ति शनि की ढैय्या या साढेसाती से परेशान है, उसे ‘शनि जयंती’ के दिन शनिदेव की पूजा-अर्चना अवश्य करनी चाहिए।इससे शनि देव प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनवांछित फल मिलता है। ‘शनि जयंती’ को शनि देव की पूजा से कुंडली के शनि-दोष, ढैय्या, साढ़ेसाती आदि के अशुभ प्रभावों से मुक्ति भी  मिलती है।