कब है ‘शीतला अष्टमी’? क्यों लगाते हैं बासी भोजन का भोग? जानें महत्व

    -सीमा कुमारी

    हिन्दू धर्म में ‘शीतला अष्टमी’ का विशेष महत्व है। ‘शीतला अष्टमी’ व्रत हर साल होली के बाद मनाई जाती है, जो इस साल 4 अप्रैल यानी अगले रविवार को है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र मास (चैत महीने) में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। ‘शीतला अष्टमी’ को बसौड़ा या शीतलाष्टमी भी कहा जाता है। इस दिन माता शीतला देवी की पूजा करने की परंपरा है। मान्यता तो ये भी है कि ‘शीतला अष्टमी’ पर माता शीतला देवी की पूजा करने से चेचक और आंखों से जुड़े विकारों से मुक्ति  मिलती है।

    ‘शीतला अष्टमी’ पर सुबह-सवेरे अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाने की प्राचीन परंपरा है। शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन माता शीतला देवी को दही, रबड़ी, मीठे चावल और पुआ आदि का भोग लगाने का विधान है। धार्मिक  मान्यता है कि माता शीतला देवी को शीतल जल और ठंडा भोजन बहुत प्रिय है। इससे माता प्रसन्न होती हैं और आरोग्यता प्रदान करती हैं। माता शीतला देवी को रात का बासी भोजन और शीतल जल अर्पित करने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। आईए जानें ‘शीतला अष्टमी’ पर क्यों है बासी भोजन का भोग लगाने और बासी भोजन करने की परंपरा?

    कथा-
    पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन माता ने सोचा कि धरती पर चल कर देखें कि उनकी पूजा कौन-कौन करता है। माता एक बूढ़ी  महिला का रूप धारण कर राजस्थान के डूंगरी गांव में गई। माता जब गांव में जा रही थी कि तभी ऊपर से किसी ने चावल का उबला हुआ पानी डाल दिया। जिससे माता के पूरे शरीर पर छाले हो गए और पूरे शरीर में जलन होने लगी। माता ने दर्द से कराहते गांव में सभी से सहायता मांगी, लेकिन किसी ने भी उनकी सहायता नहीं की।

    गांव में कुम्हार परिवार की एक महिला ने जब देखा कि एक एक बूढ़ी महिला दर्द से कराह रही है, तो उसने माता को बुलाकर घर पर बैठाया और बहुत सारा ठंडा जल माता के ऊपर डाला। ठंडे जल के प्रभाव से माता को उन छालों की पीड़ा में राहत महसूस हुई। इसके बाद कुम्हारिन महिला ने माता से कहा कि मेरे पास केवल रात का दही और रबड़ी रखी हुई है, आप इसे खाइए। रात के रखे दही और ज्वार की रबड़ी खा कर माता को शरीर में बहुत ठंडक मिली। इसके बाद कुम्हारिन ने माता से कहा कि आपके बाल बिखरे हैं, लाइए मैं कुम्हारिन इनको गूंथ देती हूं।

    जैसे ही वह महिला माता शीतला देवी की चोटी बनाने लगी तो उसे बालों के नीचे छुपी तीसरी आंख दिखी। यह देखकर वह डर कर भागने लगी। तभी माता ने कहा बेटी डरो मत में शीतला माता हूं, और मैं धरती पर ये देखने आई थी, कि मेरी पूजा कौन करता है। माता शीतला अपने मूल रूप में प्रकट हो गईं। कुम्हारिन महिला शीतला माता को देख कर भाव विभोर हो गई। उस कुम्हारिन ने माता से कहा माता मैं तो बहुत गरीब हूं। आपको बैठने के लिए कहां आसन दूं। मेरे पास तो आसन भी नहीं है। माता मुस्कुराते कुम्हारिन के गधे पर जाकर बैठ गई और झाडू से कुम्हारिन के घर से सफाई कर डलिया में डाल कर उसकी गरीबी को बाहर फेंक दिया। कुम्हारिन के निस्वार्थ श्रद्धा भाव से प्रसन्न होकर शीतला माता ने उससे वर मांगने को कहा।

    कुम्हारिन ने हाथ जोड़कर कहा- “माता, आप वर देना चाहती हैं,  तो आप हमारे डूंगरी गांव में ही निवास करें और जो भी इंसान आपकी श्रद्धा भाव से सप्तमी और अष्टमी को पूजा करे और व्रत रखे। आपको ठंडे व्यंजन का भोग लगाए उसकी गरीबी ऐसे ही दूर करें। पूजा करने वाली महिला को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दें।” माता शीतला देवी ने कहा- “बेटी, ऐसा ही होगा। और, मेरी पूजा का मुख्य अधिकार कुम्हार को ही होगा।” कहते हैं कि इसलिए माता शीतला देवी को ठंडा बासी भोजन और शीतल जल प्रिय है।