बेरोजगारी से पीढ़ी तबाह होगी 4 महीने बाद बोले मौनी मनमोहन

पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह नामी अर्थशास्त्री कहलाते हैं. वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स पढ़ा चुके हैं. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के समय वित्त मंत्री रहते हुए उदारवादी आर्थिक नीति व खुली अर्थव्यवस्था शुरू करने का श्रेय उन्हें जाता है. अमेरिका में जब 2008 में मंदी आई थी और लेहमैन संकट के चलते बैंक धड़ाधड़ बंद हो रहे थे, तब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने मनमोहन सिंह से सलाह मांगी थी कि इस संकट से कैसे निपटें? आश्चर्य है कि यही मनमोहन पिछले 4 महीनों से चुपचाप बैठे हुए थे. इस दौरान कोरोना संकट का अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ा. उद्योग-धंधे बंद हुए, कर्मचारियों की छटनी हुई और हजारों की तादाद में प्रवासी मजदूर यूपी-बिहार के अपने घरों को लौटने को मजबूर हुए लेकिन फिर भी मनमोहन मौनी बाबा बने रहे.

उन्होंने अपना कोई अर्थशास्त्र संबंधी सुझाव नहीं दिया और सरकार को भी कोई परामर्श देना उचित नहीं समझा. पता नहीं उन्होंने ऐसा उदासीन या निरपेक्ष रवैया क्यों अपनाया! क्या वे इतने महीनों से कोई गहन चिंतन कर रहे थे अथवा किसी असमंजस में घिरे हुए थे? अब मनमोहन सिंह ने कहा कि कोरोना वायरस महामारी का असर भारत के साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. कई दशकों में पहली बार भारत की अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी. इसका अर्थ है कि कई वर्षों की प्रगति उल्टी दिशा में घूम जाएगी. हमारे समाज के कमजोर वर्गों की बड़ी तादाद गरीबी में लौट सकती है. कई उद्योग बंद हो सकते हैं तथा गंभीर बेरोजगारी के कारण एक पूरी पीढ़ी खत्म हो सकती है.

यह देश व दुनिया के लिए असाधारण कठिन समय है. संकुचित अर्थव्यवस्था के चलते वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण देशवासियों की बच्चों को खिलाने और पढ़ाने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. आर्थिक संकुचन का घातक प्रभाव लंबा और गहरा होने वाला है. खास तौर पर गरीब इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे. मनमोहन सिंह ने कहा कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लाने के लिए पूरी ताकत से काम करना जरूरी है. लॉकडाउन और भयग्रस्त लोगों व कंपनियों के व्यवहार से भी आर्थिक गतिविधियों में शिथिलता आई है. लोगों को अपने जीवन और जीविका के बारे में आश्वस्त होना चाहिए. अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने या इकोनॉमिक रिवाइवल के लिए पूरे इकोसिस्टम को विश्वास में वापस लाना होगा.