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कोई निर्वाचित सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई.

    जिन देशों में लोकतंत्र कमजोर और अर्थव्यवस्था जर्जर हो, वहां अव्यवस्था व बदहाली फैलते देर नहीं लगती. भारत के अधिकांश पड़ोसी देशों का यही हाल है. पाकिस्तान में सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई का वर्चस्व लगातार बना रहने से लोकतंत्र ढंग से पनप ही नहीं पाया. कोई निर्वाचित सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. वहां की राजनीति में सीधे सेना का दखल है. फौज को नाराज करके कोई प्रधानमंत्री टिका नहीं रह सकता. वहां अयूब खान, याहया खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ जैसे जनरलों की हुकूमत रही है.

    जनरल जिया ने तो प्रधानमंत्री रहे जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया था. भुट्टो की बेटी बेनजीर की भी चुनावी प्रचार के दौरान रहस्यमय स्थितियों में मौत हुई. मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को पहले जेल भेजा और बाद में देश से निष्कासित कर दिया था. वहां के भूतपूर्व शासकों का यही हश्र होता आया है. पाकिस्तान ने औद्योगिकरण, शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की बजाय अमेरिका के टुकड़ों पर पलना बेहतर समझा. अमेरिका से जब भी मदद मिली, पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपना फौजी बजट बढ़ाया. अमेरिका ने आतंक के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान को अपना सबसे प्रमुख सहयोगी माना था लेकिन उसी पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन को अपने यहां पनाह दे रखी थी जिसे अमेरिका के सील कमांडोज ने घर में घुसकर मार गिराया.

    जब अमेरिका को पाक की असलियत देर से समझ में आई तो तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि हमने पाकिस्तान को अरबों डॉलर दिए लेकिन उसने हमें बेवकूफ बनाया. पाकिस्तान को अमेरिकी मदद मिलनी बंद हुई तो वह चीन की गोद में जा बैठा. चीन किसी देश को कर्ज देता है तो उसके संसाधनों पर कब्जा कर लेता है. पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित ग्वादर पोर्ट चीन के नियंत्रण में है. इस समय पाक की आर्थिक स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है. जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं. विश्व बैंक व आईएमएफ से कर्ज नहीं मिल रहा है. शहबाज शरीफ की नई सरकार के सामने महंगाई, अभाव और बेरोजगारी की गंभीर चुनौती है. चीनी कंपनियों ने खुली धमकी दी है कि यदि 300 अरब रुपये की बकाया रकम नहीं चुकाई गई तो पाकिस्तान की बत्ती गुल कर देंगे.

    चीन के जाल की जकड़न

    चीन के कर्ज जाल में फंसकर श्रीलंका की दुर्दशा हो गई. उसके संसाधनों पर चीनी कंपनियों ने कब्जा कर लिया. श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह 99 वर्ष की लीज पर चीन ने अपने कब्जे में ले लिया. इस समय श्रीलंका में सबसे भीषण आर्थिक संकट है. पेट्रोल-डीजल, खाने-पीने की वस्तुओं का भारी अभाव है. ऐसे में भीड़ सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गई. गृहयुद्ध की स्थितियां हैं. बौखलाई हुई भीड़ ने 1 सांसद सहित 8 लोगों की हत्या कर दी. श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे  भीड़ की लिंचिंग का शिकार होने से बाल-बाल बचे. उन्हें सशस्त्र सैनिकों ने बड़ी मुश्किल से बचाया. उन्होंने परिवार सहित त्रिनकोमाली नेवल बेस में शरण ले रखी है. देश में इमरजेंसी लागू है. प्रधानमंत्री महिंदा और स्वास्थ्य मंत्री जयसुमना ने इस्तीफा दे दिया. श्रीलंका ऐसे अंधेरे मोड़ पर जा पहुंचा है कि उसे संकट से उबरने का रास्ता नहीं सूझ रहा है.

    नेपाल में भी डांवाडोल स्थिति

    नेपाल पर चीन का भारी आर्थिक व राजनीतिक दबाव बना हुआ है. नेपाल सीमा तक चीन ने सड़कें बना ली हैं. नेपाल अपनी 70 प्रतिशत जरूरतों के लिए भारत से आयात पर निर्भर रहता है. उसके लिए जरूरी है कि चीन और भारत दोनों को खुश रखे. नेपाल में केपी शर्मा ओली और कमल दहल प्रचंड दोनों ही कम्युनिस्ट नेता चीन की कठपुतली हैं. तिब्बत पर कब्जे के बाद नेपाल को भी अपने चंगुल में फंसाने की चीनी ड्रैगन की मंशा किसी से छिपी नहीं है.