गन्ना, प्याज, अंगूर के मुकाबले कपास, सोयाबीन के लिए नगण्य राशि

    महाराष्ट्र मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य में कपास और सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष कार्ययोजना के तहत 3 वर्षों में 1,000 करोड़ रुपए की निधि देने की स्वीकृति दी गई जो बहुत नगण्य है. इस विशेष कार्य योजना के क्रियान्वयन के लिए कृषि मंत्री की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जाएगी. राज्य में कपास की खेती 42 लाख हेक्टेयर और सोयाबीन की खेती 46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है. आश्चर्य और खेद की बात है कि गन्ना, प्याज, अंगूर जैसी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए काफी अधिक धनराशि मंजूर की जाती है. इसके विपरीत विदर्भ में उत्पन्न होनेवाली कपास और सोयाबीन की खेती की अनदेखी की जाती है और बेमन से 1,000 करोड़ रुपए की योजना बनाकर टरका दिया गया. यह विदर्भ पर एक और घोर अन्याय है. समझ में नहीं आता कि ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों किया जाता है?

    विदर्भ में सिंचाई साधन नहीं

    पश्चिम महाराष्ट्र में गन्ना, प्याज व अंगूर जैसी फसलों की काफी पैदावार होती है. वहां इन फसलों के लिए भरपूर सिंचाई साधन उपलब्ध हैं. प. महाराष्ट्र का डेढ़ एकड़ खेती वाला किसान विदर्भ के 5 एकड़ वाले किसान की तुलना में बहुत ज्यादा कमाई करता है. वजह बिल्कुल स्पष्ट है. सिंचाई की व्यवस्था होने से पश्चिम महाराष्ट्र का किसान वर्ष में 3 फसलें लेता है. फलोत्पादन व सब्जियों की पैदावार भी कर लेता है. विदर्भ में नदियां तो हैं लेकिन सिंचाई योजनाएं दशकों से धूल खाती पड़ी हैं.

    गोसीखुर्द बांध प्रोजेक्ट की आधारशिला राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए रखी गई थी. इस परियोजना की रफ्तार अत्यंत धीमी रही और अभी तक पूरी नहीं हो पाई. इसके विपरीत पश्चिम महाराष्ट्र में इसके बाद शुरू किए गए प्रकल्प तेजी से बनकर पूरे हो गए. विदर्भ का किसान कर्ज और अभाव में पैदा होता है और उसी में मरता है. उसके उद्धार या उत्थान की कोई सोचता ही नहीं.

    वर्षा पर निर्भर खेती

    कम पानी में पैदा होने वाली फसलों की पैदावार करना विदर्भ के किसानों की मजबूरी है क्योंकि यहां की कृषि वर्षा पर निर्भर रहती है इसलिए कपास, तुअर तथा सोयाबीन ही यहां की मुख्य फसलें हैं. विदर्भ की काली मिट्टी भी कपास के लिए अनुकूल होती है. सिर्फ गोंदिया, भंडारा जिलों में धान की खेती होती है. कृषि तभी फायदेमंद हो सकती है जब किसान वर्ष में एक से ज्यादा फसल ले सके. इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता है, जिसका विदर्भ में अभाव है.

    यहां खेत बड़े हैं लेकिन आय कम है. कपास और सोयाबीन दोनों ही नकद फसलें या कैश क्रॉप हैं. एक समय था जब कपास और सोने के भाव में ज्यादा अंतर नहीं था. किसान कपास बेचकर कुछ न कुछ सोना खरीदा करते थे. समय के साथ सोने की कीमतें आसमान छूती चली गईं. अभी सोना प्रति 10 ग्राम 50,000 रु. के आसपास है जबकि कपास की दर 9500 रु. से 10,000 रु. क्विंटल है. पिछले वर्षों में तो कपास के दाम इससे भी काफी कम थे.

    विदर्भ के कपास व सोयाबीन किसानों को प्रगतिशील किसानों की बराबरी पर लाना और मूल्य श्रृंखला लागू करना है तो विशेष कार्य योजना के लिए अधिक राशि आवंटित करनी होगी. सरकार भी जानती है कि देश में खाद्य तेलों की कमी व बढ़ते दाम देखते हुए तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है, इसलिए कपास और सोयाबीन के साथ सूरजमुखी, सरसों, तिल व अलसी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए विशेष कार्य योजना लागू की जा रही है.