New FIR will not be registered, sedition law suspended

सुप्रीम कोर्ट राजद्रोह संबंधी कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है.

    विगत वर्षों में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों पर सरकारी नीतियों या सत्तारूढ़ नेताओं के खिलाफ असहमति सूचक विचार व्यक्त करने पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया. इस बात पर गौर नहीं किया गया कि संविधान ने अभिव्यक्ति का मूलाधिकार दिया है जो लोकतंत्र से पूरी तरह सुसंगत है. इसके पहले मद्रास हाई कोर्ट सहित अन्य हाई कोर्ट ने भी कहा है कि केवल सरकार या सरकारी नीतियों का विरोध करना देशद्रोह नहीं है. आजादी के 75 वर्ष बाद भी उपनिवेशवादी दमन के प्रतीक राजद्रोह के कड़े कानून को जारी रखने का आज क्या औचित्य है?

    ब्रिटिश काल से चले आ रहे राजद्रोह कानून के मनमाने इस्तेमाल से उत्पन्न चिंताजनक स्थिति पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के मामलों में सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी. इसके साथ ही केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया गया कि जब तक सरकार औपनिवेशिक युग के इस कानून पर फिर से गौर नहीं कर लेती, तब तक राजद्रोह के आरोप में कोई नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाए. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत व न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि राजद्रोह के आरोप से संबंधित सभी लंबित मामले, अपील व कार्यवाही को स्थगित रखा जाना चाहिए. पीठ ने कहा कि अदालतों द्वारा आरोपियों को दी गई राहत जारी रहेगी. सुप्रीम कोर्ट राजद्रोह संबंधी कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है.

    इसके पूर्व केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा था कि पुलिस अधीक्षक रैंक के अधिकारी को राजद्रोह के आरोप में दर्ज प्राथमिकियों की निगरानी करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है. मेहता ने यह भी निवेदन किया था कि राजद्रोह आरोप में एफआईआर दर्ज करना बंद नहीं किया जा सकता क्योंकि यह प्रावधान एक संज्ञेय (कॉग्निजिबल) आरोप से संबंधित है और 1962 में एक संविधान पीठ ने इसे बरकरार रखा था. केंद्र ने राजद्रोह के लंबित मामलों के संबंध में सुको को सुझाव दिया कि इस प्रकार के मामलों में जमानत याचिका पर शीघ्रता से सुनवाई की जा सकती है क्योंकि सरकार हर मामले की गंभीरता से अवगत नहीं है और ये मामले आतंकवाद, धनशोधन (मनीलांड्रिंग) से जुड़े हो सकते हैं.

    6 वर्षों में 356 केस दर्ज

    ब्रिटिश शासनकाल में लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी जैसे नेताओं के खिलाफ जिस राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जाता था, वही पिछले 6 वर्षों में धड़ल्ले से केंद्र व राज्य सरकारों ने इस्तेमाल किया है. 6 वर्षों से इसके तहत 356 केस दर्ज हुए लेकिन 12 ही साबित हो पाए. भारतीय दंड विधान की धारा 124ए के अनुसार, ‘जब कोई व्यक्ति बोले गए या लिखित शब्दों, संकेतों द्वारा या किसी अन्य तरह से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने का प्रयास करता है या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष भड़काने का प्रयास करता है तो वह राजद्रोह का आरोपी है.’ राजद्रोह एक गैर जमानती अपराध है जिसमें 3 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माने का प्रावधान है.