केजरीवाल की गिरफ्तारी से जर्मनी, अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र क्यों बौखलाए

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जर्मनी, अमेरिका और अब संयुक्त राष्ट्र संघ ! दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) की गिरफ्तारी के बाद से दुनियाभर के महत्वपूर्ण अखबार और टीवी चैनल लगातार उन पर रिपोर्ट कर रहे हैं, दुनिया के महत्वपूर्ण देश भी टिप्पणियां करने से नहीं चूक रहे। हम भले तेज स्वर में जर्मनी से लेकर अमेरिका तक को याद दिला रहे हों कि अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी या उनसे पूछताछ हमारे देश का आंतरिक मामला है, इसमें किसी को दखल नहीं देना चाहिए। जिस तरह के आरोपों के चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया है, उसका सीधे-सीधे रिश्ता मानवाधिकारों और भ्रष्टाचार से है।
उल्लेखनीय है कि केजरीवाल ने कहा कि अगर महज मुंहजुबानी किसी पर आरोप लगा देने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है तो वह अगर देश के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं पर आरोप लगा दें कि उन्होंने 100 करोड़ रुपये की घूस दी है, तो क्या उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा? भले ही केजरीवाल के विरोधी उनके इस आरोप को उनकी वाकपटुता कहकर खारिज करते हों, लेकिन इतिहास कभी भी तर्कों को खारिज नहीं करता। जब अदालत में बिना उत्तेजित हुए, बड़ी सहजता से केजरीवाल कहते हैं कि जिस व्यक्ति द्वारा उनका नाम लेने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है, उसी व्यक्ति को जब जमानत दी जाती है, तो वह बाहर निकलकर सत्तारूढ़ पार्टी को 55 करोड़ रुपये के इलेक्ट्रोरल बांड़ के जरिये

चंदा देता है। क्या यह बात दाल में कुछ काला होने की तरफ इशारा नहीं करती? हो सकता है यह सच न हो और अरविंद केजरीवाल अपनी स्मार्टनेस के चलते इस तरह का नैरेटिव बना रहे हों लेकिन अदालत या ताकतवर राजसत्ता पर, इस तरह के आरोपों की पूरी तरह से अनदेखी किए जाने पर क्या सवाल नहीं उठेंगे? जिस तरह से सारी स्थितियों को अनदेखा किया जा रहा है, उस पर वर्तमान में भले कोई कुछ न कह सके लेकिन भविष्य की पीढ़ियां हमारे इन तमाम फैसलों को, हमारी अनदेखियों को कटघरे में जरूर खड़ा करेंगी !

बोहरा कमेटी की रिपोर्ट

आखिर आज नहीं तो कल, कोई न कोई तो यह सवाल पूछेगा ही कि भले इलेक्टोरल बां के जरिये राजनीतिक पार्टियों को चंदा देना अपराध न हो, भ्रष्टाचार न हो लेकिन इन बां के साथ छापों, गिरफ्तारियों, आरोपों आदि की जो कई पटकथाएं जुड़ी हुई हैं, उनके चलते उन्हें शक की नजर से क्यों न देखा जाए? भविष्य में किसी के जहन में यह सवाल क्यों नहीं आएगा कि सीबीआई और ईडी ने जिन 41 कंपनियों पर जांच की या रेड डाली, आखिर उन्हीं कंपनियों ने उसी दौरान सत्तारूढ़ भाजपा को करीब 1,751 करोड़ रुपये का चंदा इलेक्टोरल बांड के रूप में क्यों दिया? उन्हें इस चंदे के बाद करीब 60-62 हजार करोड़ के कारोबार का लाइसेंस भी मिला। तीन दशक पहले वोहरा कमेटी ने नेता, अफसर, उद्योगपति और अपराधियों के गठजोड़ की एक रिपोर्ट सौंपी थी। चुनावी बांड उसी अनुमान की इबारत नहीं तो और क्या है।

भावी पीढ़ी सवाल करेगी

भविष्य की पीढ़ियां इस सवाल पर तो विचार करेंगी ही कि वह कौन सा राजनीतिक जादू होता है, जिसके चलते भ्रष्ट से भ्रष्ट राजनेता अगर सत्तारूढ़ दल में शामिल हो जाए तो उस पर लगे सभी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप छूमंतर हो जाते हैं? यह भी एक तरह की मनमानी है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है कि मतदाताओं की भावनाओं की अनदेखी करके जब कोई राजनेता अपने निजी फायदों के लिए दल बदल कर लेता है, तो वह जिस दल में जाता है, उसे भ्रष्ट नहीं माना जाता। सिर्फ घूस लेने वाला ही भ्रष्टाचार का दोषी नहीं होता, घूस देने वाला भी बराबर का दोषी होता है। चुनावों के सिर पर आते ही जिस तरह से विभिन्न दलों के राजनेताओं की अपने-अपने दलों को छोड़कर भाजपा में जाने की आंधी आई हुई है और अपवाद के लिए कांग्रेस सहित कुछ दूसरी पार्टियों में भी इस तरह के कुछ इक्का-दुक्का आमंत्रण हो रहे हैं, उन सबको अगर हम भ्रष्टाचार या राजनीतिक बेईमानी नहीं मानते या इस नजरिये से इन्हें नहीं देखते तो मानना ही होगा कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर बहुत चालाकी से अपनी इन हरकतों को भ्रष्टाचार या बेईमानी से ऊपर उठा दिया है, ताकि न तो पाला बदलने वाले राजनेता और न ही पाला बदलवाने वाले राजनेताओं को, मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होना पड़े।