चुनाव आते ही विकास को छोड़ जातियों को संभालने लगे सभी दल

    कितने ही लोग जोर-शोर से कहते हैं कि देश की एकता-अखंडता के लिए जाति प्रथा अभिशाप है तथा जात-पात का भेद नष्ट होना चाहिए, लेकिन देखा जाए तो राजनीति की धुरी जाति ही बनी हुई है. चुनाव में वोटों का गणित लगाने या उम्मीदवारों का चयन करने के मामले में जाति ही प्रमुख मुद्दा है. हर राजनीतिक पार्टी इसी राह पर चलती है. जिस दल ने जाति का समीकरण सलीके से साध लिया, वह चुनाव में अपनी सफलता की उम्मीद कर सकता है. कितने ही लोगों ने समाजवाद का अर्थ यही लिया था कि अपने-अपने समाज को बढ़ाओ. लोग देश-विदेश का हित नहीं, सबसे पहले अपने संकीर्ण स्वार्थ के लिए जातिगत सोच को आगे रखते हैं. यद्यपि प्राथमिक कक्षा की पाठ्यपुस्तक के शुरू के पृष्ठ में ही छपा रहता है- मैं भारत का नागरिक हूं, सारे भारतवासी मेरे भाई-बहन हैं, लेकिन व्यवहार में लोगों की सोच भारतीयता की न होकर जातीयता की होती है. यह भी देखा गया है कि समाज के उच्च वर्ग की तुलना में पिछड़ी जातियां ज्यादा संगठित होती हैं. यह एक कटु सत्य है कि वोट विकास के नाम पर नहीं, बल्कि जाति, भाषा और क्षेत्रीयता के नाम पर मिलते हैं.

    कुछ माह बाद यूपी और पंजाब के विधानसभा चुनाव हैं. यूपी में सत्तारूढ़ बीजेपी और पंजाब की हुकूमत संभाल रही कांग्रेस दोनों ही विकास के मुद्दे को छोड़कर जातियों को संभालने में लगे हैं. दोनों ही पार्टियां जानती हैं कि यदि जातिगत तुष्टिकरण कर दिया तो चुनाव में वोट बटोरना काफी हद तक आसान हो जाएगा. योग्यता, कर्मठता या अनुभव की बजाय इस आधार पर उम्मीदवारों का चयन होता है कि वह किस जाति का प्रतिनिधित्व करता है और उसके पीछे कितने वोटों की ताकत है.

    यूपी में योगी ने हर वर्ग को साध लिया

    उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने दूसरे कैबिनेट विस्तार में जाति, क्षेत्र और गठबंधन को ध्यान में रखते हुए 7 नए मंत्री बनाए. इनमें 1 ब्राम्हण, 3 दलित और 3 ओबीसी हैं. कांग्रेस छोड़कर 3 माह पूर्व बीजेपी में आए जितिन प्रसाद को ब्राम्हण वोटों की खातिर मंत्री बनाना जरूरी समझा गया. नए चेहरे सामने लाए गए ताकि नाराजगी और असंतुलन दूर किया जा सके. योगी ने आनन-फानन में जिस तरह मंत्रिमंडल विस्तार का फैसला किया, उसके पीछे पश्चिम उत्तरप्रदेश में किसान आंदोलन के जरिए जाटों की नाराजगी भी अहम वजह है. योगी ने मंत्रिमंडल विस्तार में कुर्मी, आदिवासी व दलित वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया है. धर्म व हिंदुत्व की राजनीति करने वाले योगी ने शुभ मुहूर्त वगैरह न देखते हुए श्राद्धपक्ष में ही मंत्रिमंडल विस्तार कर डाला ताकि चुनाव से पहले प्रशासनिक कसावट लाते हुए लोगों तक आसानी से पहुंचा जा सके.

    पंजाब में राहुल की पकड़

    पंजाब में जिस तरह मंत्रिमंडल का गठन हुआ, उसमें राहुल गांधी की मजबूत पकड़ नजर आती है. ऐसे ही लोग मंत्री बनाए गए जो राहुल की पसंद के हैं. सोनिया ने केवल इन नामों को मंजूरी दी है. दलित वर्ग के चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाली सरकार में वाल्मिकी, लुबाना और अनुसूचित जाति को स्थान दिया गया. गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र को विशेष महत्व दिया गया जहां दलितों की तादाद 40 प्रतिशत है. गांधी परिवार के प्रति निष्ठा रखने वालों को विशेष तरजीह दी गई.