वसुंधरा और पायलट की चुप्पी से कांग्रेस, बीजेपी दोनों सांसत में

राजस्थान की राजनीतिक स्थिति नाजुक बनी हुई है. पता नहीं ऊंट किस करवट बैठेगा! ऐसे समय पूर्व मुख्यमंत्री व बीजेपी नेता वसुंधरा राजे और पूर्व उपमुख्यमंत्री व पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की चुप्पी से कांग्रेस व बीजेपी दोनों ही पार्टियां सांसत में हैं. सस्पेंस गहराता जा रहा है. चुप रहने की कई वजहें हो सकती हैं. जिन्हें अपने पत्ते नहीं खोलने हैं, वे मौन साधे रहते हैं. उनके दिल में क्या है अथवा वे मौका देखकर कौन सी चाल चलने वाले हैं, यह किसी को पता नहीं होता. जहां तक राज्य की 2 बार मुख्यमंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे की चुप्पी का सवाल है, वह काफी रहस्यमय है. राजस्थान में इतनी बड़ी राजनीतिक हलचल हो रही है लेकिन उनकी ओर से कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. राज्य में बीजेपी की सबसे बड़ी नेता होने के बावजूद उनका चुप रहना हर किसी को कौतुहल में डालता है.

क्या यह कोई रणनीति है?

केंद्रीय मंत्री व बीजेपी नेता गजेंद्रसिंह शेखावत से राजस्थान में चल रहे राजनीतिक संकट पर वसुंधरा राजे की चुप्पी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वसुंधरा की चुप्पी भी एक रणनीति हो सकती है और कभी-कभी चुप्पी शब्दों से भी ज्यादा गूंजती है. यह बात अलग है कि शेखावत ने इस कथन की व्याख्या करने से इनकार कर दिया. प्रतिक्रिया के नाम पर सिर्फ इतना ही है कि राजे ने कुछ ट्वीट करते हुए कहा कि कुछ लोग राज्य के राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में भ्रम पैदा करते हैं. वसुंधरा राजे के बारे में कहा जाता है कि उनके गहलोत से अच्छे संबंध हैं. सचिन पायलट जैसे सक्रिय नेता का उभरना आगे चलकर राज्य बीजेपी के लिए गले की हड्डी साबित हो सकता है. संभवत: इसीलिए वसुंधरा राजे तटस्थ रवैया बनाए हुए हैं. न किसी के पक्ष में बोल रही हैं, न विरोध में! वसुंधरा राजे बीजेपी के केंद्रीय नेताओं की राजस्थान संबंधी नीतियों या गतिविधियों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं. वे राज्य की राजनीति को अपने खास दृष्टिकोण से देखती हैं. 

राजस्थान की राजनीतिक जंग में यह बात देखी जा रही है कि हार्सट्रेडिंग तेज हो गई है और शक्ति परीक्षण में जितना विलंब होगा, गहलोत की पकड़ उतनी ही कमजोर होती चली जाएगी. गहलोत व पायलट अपने-अपने खेमे के विधायकों को साधे रखने में लगे हैं. आशंका यही है कि कोई छिटक न जाए. राज्यपाल कलराज मिश्र का कहना है कि जब मुख्यमंत्री कहते हैं कि उनकी सरकार बहुमत में है तो वे शक्ति परीक्षण के लिए सत्र बुलाने की मांग क्यों कर रहे हैं?

पायलट का मौन क्यों

सचिन पायलट को जितना गरजना-बरसना था, उतना उन्होंने कर लिया. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर आरोपों की तोप दागी. कांग्रेस के बड़े नेताओं के समझाने से भी नहीं माने और बगावत का झंडा बुलंद रखा. पायलट को अपनी ताकत पर भरोसा था, तभी उन्होंने यह कदम उठाया. हरियाणा ले जाकर अपने समर्थक विधायकों को टिका दिया जहां गहलोत की पहुंच संभव नहीं है. पायलट के पीछे अपना हाथ होने से बीजेपी इनकार कर रही है. केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि राजस्थान के राजनीतिक घटनाक्रमों से बीजेपी का कोई लेना-देना नहीं है और यह कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई है जिसमें मुख्यमंत्री गहलोत और उनके पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट शामिल हैं. राज्य में यह ड्रामा इसलिए चल रहा है क्योंकि अशोक गहलोत पायलट व उनके समर्थक विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना चाहते हैं. राजस्थान कांग्रेस विधायक दल की अर्जी पर विचार कर विधानसभा अध्यक्ष ने पायलट व उनके खेमे के विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया. पायलट ने स्पीकर के नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी. पायलट और उनके साथी विधायकों ने विधानसभा में पार्टी व्हिप की कोई अवहेलना नहीं की क्योंकि विधानसभा सत्र में नहीं है. दलबदल की आशंका अयोग्यता का आधार नहीं बन सकती. किसी भी राजनीतिक दल में जो नेता पार्टी के भीतर अधिकतम समर्थन हासिल करता है, वही शीर्ष स्थान का हकदार होता है.

बीजेपी की क्या भूमिका है

कांग्रेस सरकार में दरार पड़ते ही केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत, बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर तथा गुलाबचंद कटारिया जैसे नेताओं ने गहलोत सरकार पर हमलावर रुख अपनाया था जबकि वसुंधरा राजे अब तक पूरे मामले से दूरी बनाए हुए हैं. रालोद सांसद हनुमान बेनीवाल का आरोप है कि वसुंधरा ही अशोक गहलोत सरकार की डूबती नैया की खिवैया बनी हुई हैं. वे इस अल्पमत सरकार को बचाने का पुरजोर प्रयास कर रही हैं तथा उन्होंने सीकर व नागौर जिलों के कांग्रेस विधायकों को इस बारे में फोन कर सचिन पायलट से दूरी बनाने को कहा था. वसुंधरा राजे व गहलोत का आंतरिक राजनीतिक गठजोड़ है.