चुनाव वर्ष में दरियादिली, भारत रत्न देने में भरपूर उदारता

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केंद्र सरकार (Central Government) ने इस वर्ष भरपूर उदारता दिखाते हुए कुल 5 शख्सियतों को राष्ट्र का सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रत्न’ (Bharat Ratna) प्रदान करने की घोषणा की है।  यह निर्णय एक साथ न लेकर क्रमगत रूप से लिया गया। पहले तो समाजवादी नेता व बिहार की नामी हस्ती कर्पूरी ठाकुर (Karpuri Thakur) को यह सम्मान देने का एलान किया गया। 

उसके 11 दिन बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता व पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) को यह अलंकरण देने की घोषणा की गई।  इससे यह संदेश गया कि सरकार ने मंडल और कमंडल की परस्पर विरोधी राजनीति में समन्वय कर दिखाया।  समाजवादी भी खुश और भाजपाई भी प्रसन्न। 

चूंकि यह चुनाव वर्ष है इसलिए सरकार को लगा कि कोई काम आगे के लिए बकाया क्यों रखा जाए! उसके ध्यान में आया कि बिहार से कर्पूरी ठाकुर का नाम तो घोषित कर दिया लेकिन उत्तरप्रदेश और तेलंगाना का क्या? राष्ट्रीय राजनीति में वहां के बड़े नेताओं को भी सर्वोच्च अलंकरण से नवाजा जाना चाहिए। 

इसलिए पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह और पीवी नरसिंहराव के नामों की भी घोषणा की गई।  कुछ लोग तर्क कर सकते हैं कि मोदी सरकार के 10 वर्ष के शासन में इन्हें पहले क्यों नहीं भारत रत्न दिया गया? क्या इसके लिए चुनाव वर्ष का इंतजार किया जा रहा था? सीधा गणित है कि चौधरी चरणसिंह के बहाने यूपी से लेकर हरियाणा तक जाट वोटों पर निगाह है। 

चरणसिंह के पोते व राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख जयंत चौधरी ने कहा भी कि मजा आ गया! मेरे लिए भावुक पल और यादगार है।  पीएम मोदी ने साबित कर दिया कि वे देश की भावना और चरित्र को बखूबी समझते हैं। 

पीवी नरसिंहराव को भारत रत्न देना तेलुगू भाषी जनता व देश के दक्षिणी हिस्से को प्रभावित करेगा।  उनके पीएम रहते ही बाबरी ढांचा टूटा था।  वे कांग्रेस के ऐसे प्रधानमंत्री थे जो नेहरू-गांधी परिवार से नहीं थे और फिर भी उन्होंने 5 वर्ष तक अल्पमत सरकार चलाई थी।  तेलुगू बिड्डा कहे जाने वाले नरसिंहराव के पीएम रहते देश में उदार आर्थिक नीति लागू हुई थी।

 उनके निधन पर कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी कद्र नहीं की थी और अंतिम संस्कार के लिए उनका पार्थिव शरीर दिल्ली से उनके राज्य भेज दिया था।  राव विद्वान, अनेक भाषाओं के ज्ञाता और लेखक थे लेकिन सरकार के मुखिया रहते हुए वह फैसला लेना टालते थे।  एक अवसर पर उन्होंने कहा भी था कि निर्णय न लेने का निर्णय करना भी एक कला है। 

उनके पीएम रहते ही झामुमो रिश्वत कांड हुआ था।  मोदी सरकार ने हरित क्रांति के जनक व कृषि वैज्ञानिक डा।  एमएस स्वामीनाथन को भारत रत्न देकर अपना कर्तव्य निभाया है।  1966 में भीषण खाद्य संकट के दौर में जब विदेश से अनाज मंगाने की नौबत आई थी तब डा।  स्वामीनाथन ने अधिक फसल देनेवाली गेहूं की प्रजातियों का विकास किया था।  यह सम्मान तो उन्हें बहुत पहले दिया जाना चाहिए था।