रोक लगाने में असमर्थता, राजस्थान में बाल विवाह का पंजीयन

    केवल राजस्थानी ही नहीं, देश के कर्नाटक, असम, बंगाल, तमिलनाडु और तेलंगाना में भी बाल विवाह की परंपरा चली आ रही है. अक्षय तृतीया पर राजस्थान में बड़ी तादाद में बाल विवाह होते हैं. ऐसे आयोजनों में राजनेताओं की मौजूदगी भी देखी जाती है. बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत नाबालिगों की शादी अपराध है, फिर भी बाल विवाह पर सक्षम तरीके से रोक नहीं लग पाई है. समाज के कुछ वर्गों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह सामान्य माना जाता है. 

    राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 2020 के बाल विवाह के मामलों में इसके पिछले वर्ष की तुलना में 50 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. देश में ऐसे कुल 785 मामले दर्ज किए गए जिनमें से कर्नाटक के सर्वाधिक 184 मामले थे. समाज की सोच में बदलाव लाए बिना बाल विवाह पर रोक लगाना संभव नहीं है. आंकड़ों की बात करें तो बाल विवाह निषेध कानून में 2015 में 293, 2016 में 326, 2017 में 395, 2018 में 501 तथा 2019 में 523 मामले दर्ज किए गए. 

    बाल विवाह तो होते ही रहते हैं लेकिन इनकी खबरें ज्यादा आने से आंकड़े बढ़ते चले गए. 2020 में असम में 138, बंगाल में 98, तमिलनाडु में 77 व तेलंगाना में 62 मामले दर्ज किए गए. बाल विवाह होने पर लड़का या लड़की पारिवारिक जिम्मेदारी संभालने लायक नहीं रहते. लड़कियों के स्वास्थ्य पर भी इसका विपरीत असर पड़ता है क्योंकि कम उम्र में ही मातृत्व की जिम्मेदारी आ जाती है. 

    राजस्थान सरकार बाल विवाह की कुप्रथा को रोक नहीं पाई, बल्कि उसे कानूनी रूप देने के लिए बाल विवाह का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन करेगी. अभिभावक या माता-पिता को 30 दिन पहले इसकी सूचना देनी होगी. यह विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया. राजस्थान विधानसभा में विपक्ष ने इसका विरोध किया. बीजेपी ने इसे काला कानून बताया और कहा कि यह चाइल्ड मैरिज एक्ट का उल्लंघन है. यह एक बड़ी भूल है. यह विधेयक कम उम्र के बच्चों की शादी के लिए प्रेरित करेगा.