PM केयर्स फंड पर दोहरी भूमिका क्यों?

क्या पीएम केयर्स फंड (PM-CARES fund) को लेकर सरकार की भूमिका बदल गई है? कोरोना संकट (Coronavirus) के दौर में बनाए गए इस फंड के बारे में पहले कहा गया था कि यह फंड निजी है. यह प्रधानमंत्री के राहत कोष (पीएम रिलीफ फंड) (PM CARES FUND) से बिल्कुल अलग है. इसे पीएम मोदी (Narendra Modi) ने मार्च माह में इसलिए स्थापित किया था ताकि कोरोना काल के दौरान आपातकालीन जरूरतों को पूरा किया जा सके.

अब एक आरटीआई आवेदन के जवाब में कहा गया कि पीएम केयर्स फंड पूरी तरह व्यक्तियों, संगठनों, सीएसआर, विदेशी व्यक्तियों, विदेशी संगठनों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से प्राप्त होनेवाले अनुदान पर चलता है. यह किसी भी सरकार द्वारा वित्त पोषित नहीं है. कोई सरकार इसके लिए पैसा नहीं देती और ट्रस्टी के तौर पर निजी व्यक्ति ही इसका संचालन करते हैं. इसलिए यह आरटीआई कानून के दायरे में नहीं आता. ऐसे में पीएम केयर्स फंड को किसी भी तरह से सार्वजनिक निकाय नहीं माना जा सकता. उल्लेखनीय है कि पीएम केयर्स फंड की ट्रस्टी डीड में कहा गया है कि यह सरकार का या उसके द्वारा नियंत्रित नहीं है. जब यह बात रिकार्ड पर है तो अब सरकार कैसे कह रही है कि फंड सरकार का ही है और उसपर नियंत्रण भी उसी का है.

यह कैसा विरोधाभास है? अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पीएम केयर्स फंड सरकारी निकाय के तौर पर चिन्हित किया गया है जो दानदाताओं से करोड़ों रुपए का अनुदान स्वीकार करता है. इसके बावजूद अन्य सरकारी संगठनों की तरह पीएम केयर्स फंड उसे मिले दान की जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है. मतलब यह कि कोई पूछना चाहे कि किसने कितनी रकम दी और यह पैसा ब्लैक मनी तो नहीं था. उसे दान देने के एवज में क्या लाभ पहुंचाया गया तो ऐसे तमाम प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दिया जाएगा. इस फंड पर सरकार ने अपना स्वामित्व व नियंत्रण स्वीकार कर लिया है परंतु इसमें दान देने पर कोई टैक्स रियायत नहीं मिलती. जबकि प्रधानमंत्री राहत कोष में दान देने पर कर में छूट दिए जाने का प्रावधान हैं. इससे संदेह होता है कि क्या लोग पीएम केयर्स फंड में नंबर दो का पैसा या छिपावनी रकम दे रहे हैं और सरकार इसकी जानकारी किसी को भी देने के लिए बिल्कुल बाध्य नहीं है. ऐसी विरोधाभासी भूमिका क्यों अपनाई जा रही है? आखिर माजरा क्या है?