अधर में रह गए किसान फसल बीमा का मुनाफा तो कंपनियों ने कमाया

किसानों को लुभावने सपने दिखाने के बाद उनसे वादाखिलाफी करना छल नहीं तो और क्या है! प्रधानमंत्री की फसल बीमा योजना भी एक छलावा या जुमला साबित हुई. जब केंद्र सरकार अपने दम पर इसे चला पाने में असमर्थ थी

किसानों को लुभावने सपने दिखाने के बाद उनसे वादाखिलाफी करना छल नहीं तो और क्या है! प्रधानमंत्री की फसल बीमा योजना भी एक छलावा या जुमला साबित हुई. जब केंद्र सरकार अपने दम पर इसे चला पाने में असमर्थ थी तो इस योजना को शुरू ही क्यों किया गया? इस योजना का लाभ किसानों को कम और बीमा कंपनियों को ज्यादा हुआ. इतना होने पर भी बीमा कंपनियां इस योजना को अधर में छोड़कर भाग रही हैं. केंद्र सरकार ने भी फसल बीमा योजना से हाथ खींचने शुरू कर दिए हैं. पहले तो सरकार ने उन किसानों को फसल बीमा में शामिल होना अनिवार्य कर दिया था जिन्होंने सरकार की किसी योजना या बैंकों से कर्ज ले रखा हो. अब सरकार ने यह शर्त हटा दी. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में फैसला लिया गया कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को ऐच्छिक बना दिया गया है. योजना खटाई में पड़ने की प्रमुख वजह यह है कि केंद्र सरकार चाहती थी कि राज्य सरकारें 70 से 75 फीसदी तक प्रीमियम का भुगतान करें. इसके लिए राज्य तैयार नहीं थे. हरियाणा की बीजेपी सरकार ने भी अपने बजट में यही संकेत दिया. अब केंद्र की होशियारी यह है कि एक तो इस योजना से अनिवार्यता की शर्त खत्म कर वह किसानों से वाहवाही लूटेगी, दूसरी ओर केंद्र को पता है कि अनिवार्यता की शर्त खत्म होते ही किसान फसल बीमा निकालना बंद कर देंगे. ऐसे में केंद्र सरकार राज्य सरकारों को दोषी ठहराकर अपना पीछा छुड़ा लेगी. केंद्र सरकार इस बात से अवगत है कि राज्यों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वो किसानों का बीमा प्रीमियम भर दें. ऐसी हालत में केंद्र इस योजना के विफल होने का दोष राज्य सरकारों पर मढ़ सकती है. यह सचमुच चिंताजनक है कि बीमा कंपनियां अपना मुनाफा समेट कर जा रही हैं लेकिन क्या किसानों को पुराना बकाया क्लेम मिल पाएगा? इन कंपनियों ने 2016-17 में 21,896 करोड़ रुपए का प्रीमियम वसूला जबकि भुगतान 16,657 करोड़ रुपए का किया. इसी प्रकार 2017-18 में 25,461 करोड़ का प्रीमियम आया जबकि क्लेम का भुगतान 21,694 करोड़ रुपए किया गया. 2018-19 में 28,802 करोड़ का प्रीमियम लेकर 17,790 करोड़ का दावा भुगतान किया गया. इस तरह कंपनियां फायदे में रहीं. अब किसानों को राज्य सरकारों और बीमा कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया गया.