सरकारी वकील को ‘आफीसर ऑफ द कोर्ट’ माना जाता है

    न्यायदान में तत्परता से सहयोग देना उसका कर्तव्य है. इतने पर भी मध्यप्रदेश के सरकारी वकीलों के विचित्र रवैये से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस नाराज हो उठे और उन्होंने कड़ी फटकार लगाई. यूं तो वकीलों द्वारा सुनवाई टालने के लिए अदालत से अनुरोध कर एडजोर्नमेंट लेना सामान्य बात है लेकिन कभी-कभी इसकी अति भी हो जाती है. इससे मामले की सुनवाई लंबे समय के अटक जाती है. 

    यदि सरकारी वकील सुनवाई टालने को कहता है तो इसका मतलब यह होता है कि वह केस की पूरी तैयारी नहीं कर पाया अथवा उसे कुछ सबूत या तथ्य जुटाने में विलंब हो रहा है. यह भी हो सकता है कि वह आलस्यवाद मामला टालना चाहता है और इसीलिए अगली तारीख मांग रहा है. ऐसे ही एक मामले में मध्यप्रदेश के सरकारी वकीलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई. 

    चीफ जस्टिस एनवी रमना ने सरकारी वकील की खिंचाई करते हुए राज्य के मुख्य सचिव को तलब करने की बात कही इसके बाद राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने बिना शर्त माफी मांगी. पीठ ने साफ कह दिया कि अब मध्यप्रदेश के किसी मामले की सुनवाई तभी होगी जब एडवोकेट जनरल खुद सुप्रीम कोर्ट में आकर जिरह करें. चीफ जस्टिस रमना का पारा तभी गर्म हो गया जब प्रक्रिया शुरू होते ही मध्यप्रदेश के सरकारी वकील ने सुनवाई टालने का आग्रह किया. 

    इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि मध्यप्रदेश राज्य इतना खराब है कि वहां के सरकारी वकील कभी किसी केस की सुनवाई में कोर्ट की मदद नहीं करते. या तो वे अदालत में नहीं आते और यदि आते हैं तो सुनवाई टालने का आग्रह करते हैं. पीठ के इन सवालों पर कि मध्यप्रदेश सरकार के कितने स्टैंडिंग काउंसिल हैं, केस कौन असाइन करता है, नोटिस कौन रिसीव करता है, सरकारी वकील ने अनभिज्ञता जताई. सीजेआई ने कहा कि राज्य सरकार के 20-30 वकील होते हैं और कोई पेश नहीं होता. यह आश्चर्यजनक है. अब एडवोकेट जनरल के पेश होने पर ही सुनवाई होगी.