मोदी को हटाने का लक्ष्य, ‘इंडिया’ के पास आरोपों के अलावा क्या है?

Loading

विपक्षी पार्टियों का ‘इंडिया’ गठबंधन जनता के बीच अपनी कितनी विश्वसनीयता उत्पन्न कर पाया है, इसका पता तो चुनाव में ही चल पाएगा। इस गठजोड़ का लक्ष्य विचार केंद्रित न होकर व्यक्ति केंद्रित बन गया है तभी तो दिल्ली के रामलीला मैदान की अपनी महारैली में उद्घोष किया गया कि लोकतंत्र बचाना है, मोदी को हटाना है। क्या इसी नारे में ‘इंडिया’ का कॉमन एजेंडा सिमटा हुआ है? चुनाव इतने निकट रहते हुए भी गठबंधन का कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम या कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जनता के सामने नहीं आया।
 
बीजेपी और सरकार पर आरोप लगाने के अलावा यह भी तो बताना चाहिए कि विपक्ष कौन सा सार्थक विकल्प देने जा रहा है। देशवासी कैसे मानें कि विपक्ष की एकजुटता टिकाऊ रहेगी और उनका सर्वमान्य नेता कौन रहेगा? कहीं यह एकता सिर्फ मंच तक तो सीमित नहीं रह जाएगी? आरोपों और शिकायतों से ही सबकुछ नहीं होता। वैसे आरोपों की बुनियाद में विपक्षी नेताओं की आशंकाएं हैं जैसे कि राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी चुनाव से पहले मैच फिक्सिंग कर रहे हैं वे देश के संविधान को खत्म करना चाहते हैं। बीजेपी फिर सत्ता में आई तो संविधान बदल देगी।

पूरे देश में आग लगने जा रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि ये सरकार किसी पार्टी के खाते फ्रीज कर देती है, किसी को जेल भेज देती है। इनको लगता है कि डंडे से काम चला लेंगे। जहां तक मुद्दे की बात है गठबंधन ने चुनाव आयोग के सामने 5 मांगे रखी हैं जैसे कि चुनाव में सभी को समान अवसर सुनिश्चित किया जाए।

सीबीआई और इनकम टैक्स की कार्रवाई रोकी जाए। हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल को रिहा किया जाए। विपक्ष को वित्तीय रूप से कमजोर करने की कोशिशें बंद हो तथा बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड से मिले फंड की एसआईटी जांच हो। विपक्षी गठबंधन भी जानता है कि इनमें से कितनी ही मांगों को मानने या पूरी करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। फिर भी आचार संहिता लागू रहते हुए सत्तापक्ष व विपक्ष को चुनाव में समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए चुनाव आयोग काफी कुछ कर सकता है।
 
चुनाव आयोग की शक्तियों की सुप्रीम कोर्ट ने भी पुष्टि की है। यदि चुनाव बिना किसी भय या पक्षपात के कराना है तो विपक्ष की आशंकाएं दूर करनी होंगी। इस रैली में केजरीवाल का जेल से भेजा संदेश उनकी पत्नी सुनीता ने सुनाया जिसमें केजरीवाल की 6 गारंटी हैं। यह गारंटी दिल्ली तक तो ठीक है, लेकिन क्या देशव्यापी स्तर पर गठबंधन के सभी दलों को स्वीकार्य होंगी?