जब चौथी लहर का डर नहीं फिर ट्रेन यात्रा में मास्क अनिवार्य क्यों

    क्या सरकारी विभाग मिलजुलकर कोई ठोस निर्णय नहीं लेते? यह कैसी विसंगति है कि एक ओर तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि कोरोना की चौथी लहर से न डरें, वहीं दूसरी ओर रेलवे ने यात्रियों को मास्क लगाने का आर्डर दिया है! आदेशों में एकरूपता का अभाव है. क्या स्वास्थ्य मंत्रालय की निगाह में स्थिति निरापद है? यदि ऐसा है तो रेलवे इसे गंभीर क्यों मानता है? स्वास्थ्य मंत्रालय मानता है कि कोरोना की घातक लहर आकर चली गई.

    ओमिक्रॉन की तीसरी लहर भी मामूली साबित हुई. बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन के कारण अधिकांश आबादी ने इम्युनिटी हासिल कर ली है. अब वायरस पहले जैसा खतरनाक नहीं रह गया. कोरोना खत्म नहीं होगा लेकिन मामूली सर्दी-खांसी जैसा बनकर रह जाएगा. उसके नए म्यूटेशन जानलेवा नहीं होंगे. लॉकडाउन हट जाने के बाद सब कुछ सामान्य हो गया है और मास्क लगाना अनिवार्य न होकर स्वैच्छिक रह गया है. जिंदगी पटरी पर लौट आई है.

    स्कूल, कॉलेज, बाजार, सिनेमाघर सभी खुल गए हैं. वर्क फ्रॉम होम का चलन खत्म होकर लोग कार्यस्थल पर जाने लगे हैं. जब इतना अनुकूल परिवर्तन हो गया है और लोग निर्भीक होकर उत्सव, शादी-ब्याह में खुलकर मिलने-जुलने लगे हैं तो फिर रेलवे क्यों ट्रेन यात्रा में मास्क लगाना अनिवार्य कर रही है? क्या स्वास्थ्य मंत्रालय के दावे पर उसे भरोसा नहीं है? रेलवे का रवैया भिन्न है. रेलवे बोर्ड ने सभी जोन के चीफ कमर्शियल मैनेजरों को पत्र लिखकर कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार के कोविड संबंधी प्रोटोकाल का पालन किया जाए.

    उस एसओपी का पालन करें जो 22 मार्च को जारी किया गया था. यदि यात्री बिना मास्क लगाए सफर करते मिलते हैं तो ऐसे यात्रियों पर जुर्माने की कार्रवाई हो सकती है. सुरक्षा के लिहाज से रेलवे बोर्ड ने सभी ट्रेनों और स्टेशन परिसर में यात्रियों को मास्क लगाने की सलाह दी है. रेलवे स्टाफ को भी मास्क लगाने को कहा गया है.