Farmers protest

देश के किसान सब्सिडी (Delhi farmers protes) और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बिना रह नहीं सकते. यह उनके अस्तित्व के लिए जरूरी है. देश के लाखों किसान काफी चिंतित और व्यथित हैं कि उनका भविष्य क्या होगा. बहुत बड़ी तादाद में किसान आंदोलन कर रहे हैं तो यह बेवजह नहीं है. उनके मन में केंद्र सरकार के इरादों और नीतियों को लेकर गहरा संदेह है. सितंबर में सरकार ने संसद में 3 कृषि बिल जल्दबाजी में ध्वनिमत से पारित करा लिए. न तो इन पर संसद में चर्चा हुई, और न इन्हें चयन समिति के पास विचार के लिए भेजा गया. सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था परंतु इसे लेकर किसान जरा भी आश्वस्त नहीं हैं.

देश में 86 प्रतिशत किसान छोटे व सीमांत श्रेणी के हैं जिनके पास 5 हेक्टेयर से भी कम जमीन है. सरकार ने कह तो दिया कि किसानों को एपीएमसी के बाहर अपनी उपज बेचने की आजादी है परंतु ये छोटे किसान अपनी थोड़ी सी उपज कैसे बेच पाएंगे? वे अच्छे दाम पाने के लिए सौदेबाजी भी नहीं कर सकते. ऐसा कानून बनाने के पहले सरकार को चाहिए था कि ऐसे छोटे किसानों की सहकारी समिति बनाती जो उपज की बिक्री को लेकर मोल-भाव करने में सक्षम होती. देश में लगभग 7000 कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) हैं. बिहार, केरल व मणिपुर ने अपने यहां एपीएमसी कानून समाप्त कर दिया है लेकिन इससे किसानों की हालत नहीं सुधरी. बिचौलिए या आढ़तिए की काफी आलोचना की जाती है लेकिन किसान की फसल बाजार तक लाने और बिक्री करने में उसका ही सहयोग रहता है. किसान अपनी जरूरतों के लिए उससे अस्थायी कर्ज के रूप में आर्थिक मदद भी लेता है.

कृषि को निवेश की आवश्यकता

कृषि क्षेत्र के विकास के लिए निवेश की आवश्यकता है. सरकार मानती है कि उसके बनाए कृषि कानूनों की वजह से कारपोरेट सेक्टर यह दायित्व निभाएगा. क्या सरकार ने कारपोरेट को ऐसा करने के लिए कोई प्रोत्साहन या टैक्स रियायत दी है? किसानों को लेकर केंद्र या राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी नहीं टाल सकतीं. कृषि सुधार कौन नहीं चाहता लेकिन यह संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद हो. किसानों पर आंसू गैस और पानी की तेज धार छोड़ना समस्या का समाधान नहीं है.

गुजरात में क्या हुआ था

2014 के लोकसभा चुनाव के पहले विकास के नाम पर दक्षिण गुजरात के 42 गांव विदेशी व भारतीय मित्रों के हवाले किए गए थे. जब किसानों ने इसका विरोध किया और महामार्ग पर ट्रैक्टर लाकर यातायात बाधित किया तो 39 गांव किसानों को वापस लौटा दिए गए. शेष 3 गांवों का विकास तो हुआ लेकिन वहां से किसान गायब हो गए. कुछ की मौत हो गई तो कुछ खेती करना छोड़कर शहरों में आ गए. क्या सरकार ने किसानों को अपना दुश्मन समझा है जो उन्हें दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए अपनी ही सड़कें खोद डालीं और रास्ते में बड़े-बड़े बोल्डर डलवा दिए?

आंदोलन पर राजनीति

हरियाणा की खाप पंचायतें भी किसान आंदोलन के समर्थन में उतर चुकी हैं. केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि एमएसपी जारी रहेगी और मंडी खत्म नहीं होगी. जावड़ेकर ने भी किसानों से अपील की कि वे कृषि कानून पर कोई गलतफहमी न रखें. प्रश्न उठता है कि यदि सरकार के इरादे इतने ही साफ होते तो किसान आंदोलन क्यों होता? प्रधानमंत्री खुद क्यों नहीं किसानों को आश्वस्त करते कि उनके हित पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे और उन्हें बड़ी कंपनियों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ा जाएगा. एमएसपी या न्यूनतम समर्थन मूल्य को गारंटी के साथ कानूनी रूप क्यों नहीं दिया जा रहा है? सिर्फ आश्वासन पर किसान कैसे भरोसा करें? अब तो राज्यों में भी किसान विरोध प्रदर्शन करेंगे. पंजाब और हरियाणा के किसान बड़ी तादाद में गोलबंद होकर पहुंच रहे हैं.

किसान संगठनों की मांग

30 किसान संगठनों के नेताओं की बैठक के बाद मांग की गई कि प्रधानमंत्री स्वयं आकर किसान नेताओं से बात करें. इस मसले का समाधान सरकार के सर्वोच्च स्तर से आना चाहिए. सरकार इसे राजनीति प्रेरित, बिचौलियों का तथा खालिस्तान प्रेरित आंदोलन बताना बंद करे और बिना शर्त बातचीत के लिए सामने आए. पीएम ने एकपक्षीय तौर पर मन की बात की. उनसे पंजाब किसान यूनियन के अध्यक्ष ने प्रश्न किया कि सरकार को यह बताना चाहिए कि किस किसान ने यह कानून बनाने को कहा था? न्यूनतम समर्थन मूल्य को गारंटी कानून के तहत लाया जाए.