“यदि मेरे पास पिस्तौल होती तो मैं नरेंद्र मोदी को गोली से उड़ा देता”

मराठी भाषा में  संस्कृति, कला और नाटकों का एक विस्तृत और समृद्ध इतिहास रहा है। देश में मराठी रंगमंच ने कला जगत को गायन, वादन, नाटक, संगीत आदि क्षेत्रों में कई महान कलाकार दिये हैं। इन्हीं में से एक हैं प्रख्यात नाटककार विजय धोण्डोपन्त तेंडुलकर (Vijay Tendulkar) हैं। तेंडुलकर अपने कई नाटकों और विषयवस्तु को लेकर लंबे  समय तक विवादों में भी घिरे रहे, लेकिन कभी भी उन्होंने अपने लेखन से समझौता नहीं किया। ‘बहुमुखी प्रतिभा’ विजय तेंडुलकर. नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार, ललित निबंध लेखक, संपादक, अनुवादक, टॉक शो राइटर, स्क्रीन प्ले लेखक, स्तंभ लेखक और न जाने क्या क्या रहे हैं!

तेंडुलकर द्वारा लिखी नाटक ‘घाशीराम कोतवाल’ (Ghashiram Kotwal) का छह हज़ार से ज़्यादा बार मंचन हो चुका है। इतनी ज़्यादा बार तो शायद ही किसी भारतीय नाटक को देखा गया होगा। उनके लिखे नाटकों का हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद हुए। भारतीय नाट्य जगत में उनकी रचनाएं हमेशा इतिहास के पन्नो ने दर्ज रहेगी।उनके कुछ नाटकों पर बेहतरीन फ़िल्में भी बनीं है। जिसमें हिंदी में ‘अर्धसत्य’, ‘निशांत’ और ‘आक्रोश’ इसका उदाहरण है। मराठी में और भी ज़्यादा बनीं। उन्होंने भ्रष्टाचार, गरीबी और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर जमकर कलम चलाई। 

 समय के साथ हर साहित्यिक कृति के संदर्भ धुंधलाने लगते हैं। बदलते वक़्त के मुताबिक़ उनकी प्रासंगिकता कम-ज़्यादा हो जाती है। लेकिन विजय तेंडुलकर के लिखे नाटक आज की तारीख़ में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं। बिना एक शब्द की कांट-छाट किए बगैर। ये तथ्य ये बात साबित करने के लिए काफी है कि विजय तेंडुलकर ऐसे अद्भुत कलमकार थे, जिनकी कलम समय की पाबंदियों से आज़ाद थी। ठीक उसी तरह जिस तरह परसाई के व्यंग्य हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में 27 नाटक और 25 एकांकियां लिखीं। इनमें से कईयों को आज क्लासिक का दर्जा प्राप्त है।  इसके अलावा 2 उपन्यास, 5 कहानी संग्रह, 16 बाल-नाटक, साहित्यिक निबंधों के 5 खंड और 1 आत्मकथा उनकी साहित्यिक विरासत है।

 

तेंडुलकर ने ‘सखाराम बाइंडर’ (Sakharam Binder)अपने नाटक में अपने समय से बहुत आगे की चीज़ आंकी गई थी। उनका यह लेखन यथार्थवाद की सीमाओं पर अतिक्रमण करता हुआ बल्कि उन्हें लांघ कर आगे बढ़ता हुआ, उस ज़माने में कल्पना से परे था। पुरुषवादी अहंकार की परिधि और उसकी सीमाओं का इतना नंगा लेखा-जोखा सिर्फ विजय तेंडुलकर के ही बस की बात थी। लोगों ने उनके इस नाटक को नाटक अश्लील कहा। यहां तक कहा गया कि , ‘इस नाटक की वजह से भारतीय विवाहसंस्था को ख़तरा पैदा हो गया है’,‘ये नाटक भारतीय संस्कृति पर कालिख मल रहा है’ ये था वो शोर जो इस नाटक के पहले प्रयोग के बाद चारो तरफ से उठने लगा।

 

विजय तेंडुलकर को महाराष्ट्र तथा भारत सरकार की ओर से कई पुरस्कार और सम्मान मिले, जिसमें प्रमुख हैं 1999 में “महाराष्ट्र गौरव”, 1970 में ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’, 1984 में ‘पद्मभूषण’। उनकी लिखी कई फ़िल्मों की पटकथाओं पर कलात्मक फ़िल्में बनीं, जैसे मंथन, निशांत, आक्रोश, अर्धसत्य आदि। 

जब विजय तेंडुलकर ने मात्र 6 वर्ष के थे तब उन्होंने अपनी पहली कहानी लिखी और 11 वर्ष की आयु में पहला नाटक लिखा, उन्होंने भिनय किया और उसका निर्देशन भी किया। हमेशा से ही तेंडुलकर का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर रहा , लेकिन फ़िर भी भारत की सांस्कृतिक परम्परा और भारत की मिट्टी के प्रति उनका गहरा लगाव था। गुजरात दंगों के बाद उनका वह वक्तव्य बेहद विवादित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “यदि मेरे पास पिस्तौल होती तो मैं नरेन्द्र मोदी (Narendra modi) को गोली से उड़ा देता…” हालांकि बाद में उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा था कि गुस्सा किसी भी बात का हल नहीं निकाल सकता और वह वक्तव्य गुस्से में दिया गया था।”