प्रकृति के प्रकोप से भारत बेहाल

पर्यावरण संरक्षण के प्रति लापरवाही और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) से करोड़ों देशवासियों की जिंदगी के लिए खतरा मंडराने लगा है. यह अत्यंत गंभीर स्थिति है. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) (Environment and Water) की नई रिपोर्ट दावा करती है कि देश के तीन चौथाई से ज्यादा जिलों में तूफान, बाढ़, सूखा लू लगने और शीतलहर का खतरा बना रहता है. देश के 64 करोड़ लोग ऐसे शहरों में रहते हैं जहां मौसम बेहद खराब होने का अंदेशा बना रहता है. पिछले 50 वर्षों में बाढ़ 8 गुना ज्यादा आ रही है.

भारी वर्षा, जमीन खिसकने, तूफान और बादल फटने की घटनाएं 20 गुना बढ़ गई हैं. 1970 से 2004 तक देश में हर साल औसत रूप से 3 भयानक बाढ़ आती थी जो अब हर वर्ष 11 हो गई है. 2019 में तो देश में 16 बार बाढ़ आई जिसमें 151 जिलों में रहनेवाले 9.7 करोड़ लोग बुरी तरह प्रभावित हुए. असम में तो बाढ़ का प्रकोप अत्यंत विनाशकारी रहता है. बिहार हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आता है. गत 100 वर्षों में देश के तापमान में 0.6 डिग्री की वृद्धि हुई जिस कारण ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगे और प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती चली गईं. रिपोर्ट ने तो यहां तक कहा है कि भारत दुनिया में बाढ़ की राजधानी (फ्लड कैपिटल) बन सकता है. पहले हर साल कम से कम 100 दिन बारिश होती थी लेकिन अब मानसून जल्दी अलविदा हो जाता है. बाढ़ को रोकने के लिए नदी जोड़ो योजना पर भी विचार हुआ था लेकिन इसमें खास प्रगति नहीं हो पाई. इससे कम जलसाधन वाले प्रदेश में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो सकता है.