भारतीय उद्योगपतियों ने राजाओं-मुगलों को पीछे छोड़ दिया ओबामा की तीखी टिप्पणी

कुछ बातें सुनने में काफी कड़वी लगती हैं लेकिन हकीकत अपनी जगह है. कोई जरूरी नहीं कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा (Barack Obama) की पुस्तक ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ (A Promised Land) में लिखी सारी बातों से हर कोई सहमत हो लेकिन फिर भी उन्होंने बगैर किसी लाग-लपेट के बहुत कुछ साफ-साफ लिख दिया है. ओबामा ने भारतीय उद्योगपतियों पर निशाना साधते हुए लिखा कि उन्होंने ठाठ-बाट में राजाओं और मुगलों को पीछे छोड़ दिया. यह ऐसी सच्चाई है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता. भारत ऐसा देश है जहां अमीरी और गरीबी के बीच बहुत बड़ी खाई है.

करोड़ों देशवासियों को भूखे पेट सोने की नौबत आती है. प्रतिवर्ष शीतलहर से बड़ी तादाद में लोग मरते हैं क्योंकि उनके पास पहनने के लिए गर्म कपड़े और सिर छिपाने के लिए छत नहीं है. ग्रामीण ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में भी करोड़ों लोग घोर अभाव के बीच बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहकर जैसे-तैसे जीवन यापन करने के लिए विवश हैं. बाढ़ हर वर्ष कितने ही परिवारों को उजाड़कर बेघर कर देती है. ऐसे भी आदिवासी हैं जो भूख, अशिक्षा व बीमारी से उबर नहीं पा रहे हैं. उनकी ओर कोई झांक कर भी नहीं देखता. अमीरों की अट्टालिकाओं के पीछे झुग्गी-झोपड़ियां हर कहीं नजर आएंगी. ओबामा ने आईना दिखाते हुए लिखा है कि भारत में लाखों लोग गंदगी और बदहाली में रह रहे हैं, अकालग्रस्त गांवों या झुग्गी बस्तियों में जीवन बसर कर रहे हैं. वहीं भारतीय उद्योग के महारथी ऐसा जीवन जी रहे हैं कि इससे राजाओं और मुगलों को भी ईर्ष्या हो जाए.

सामाजिक सरोकारों से मतलब नहीं

देश के उद्योगपतियों को सोचना चाहिए कि विदेशी उनके बारे में क्या राय रखते हैं. उन्हें लगता है कि ये लोग अपार धन कमाने और विलासितापूर्ण जीवन बिताने में इतने मग्न हो जाते हैं कि अपने सामाजिक सरोकार पूरी तरह भुला बैठते हैं. वे बिल गेट्स, वारेन बफे जैसे अमेरिकी उद्योगपतियों के समान नियमित रूप से परोपकार में मोटी रकम खर्च नहीं करते. खुलकर चैरिटी नहीं करते. यहां भारतीय और अमेरिकी सोच का फर्क साफ नजर आता है. भारतीय उद्योगपति अपना बिजनेस एम्पायर खड़ा करता है और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करता है. उसे यह भी फिक्र रहती है कि उसके वंशजों के लिए कभी कोई कमी न पड़े. इसलिए इतनी दौलत कमाता है जो 7 पुश्तों तक ही नहीं, उससे भी आगे चले. पहले भारतीय उद्योगपति भी मंदिर, धर्मशाला, गौशाला, शिक्षा संस्थाएं व चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया करते थे किंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह प्रवृत्ति लुप्त सी होती जा रही है. गत 3-4 दशकों में उद्योगपतियों की जो पीढ़ी पनपी है, वे चैरिटी में विश्वास नहीं करते बल्कि अर्जित धन का और नए उद्योग-व्यवसाय खोलने में निवेश करते हैं. वे समाज के प्रति उदारमना नहीं हो पाते. क्या ओबामा का संकेत मुकेश अंबानी की 27 मंजिला अट्टालिका एंटीलिया की ओर रहा होगा?

देश या समाज को कुछ देने की भावना क्यों नहीं

स्वाभाविक है कि धन की प्रचुरता के साथ जीवनशैली में भी भव्यता आ जाती है परंतु फिर भी जिस देश व समाज से इतना कुछ हासिल किया है, उसे कुछ देने की भावना भी होनी चाहिए. क्यों नहीं ये उद्योगपति देश की गरीबी, अशिक्षा दूर करने, रोजगार के अवसर व स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने पर ध्यान देते? क्या उन्होंने सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ दिया है? बिड़ला व टाटा घराने का सामाजिक सरोकारों पर ध्यान था किंतु बाद में पनपे उद्योग घराने इस मामले में वैसी अभिरुचि या सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं. यदि वे कोई शिक्षा संस्था खोलते भी हैं तो वहां सिर्फ करोड़पतियों की संतानें पढ़ती हैं, उसका आम जनता को कोई लाभ नहीं होता. होनहार युवाओं व समाज के वंचित वर्ग के लिए उनका कौन सा योगदान है!