कांग्रेस में शामिल कन्हैया, जिग्नेश से कहां, कितना फायदा

    कांग्रेस में बुजुर्ग नेताओं का आज भी वर्चस्व है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अंबिका सोनी, अशोक गहलोत जैसे पुराने नेताओं पर ज्यादा विश्वास करती हैं. इसी तरह गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, एके एंटोनी, आनंद शर्मा आदि का दबदबा बना हुआ है. इसके पहले अहमद पटेल और आस्कर फर्नांडीज की सलाह सोनिया के लिए महत्व रखती थी. इन दोनों पुराने नेताओं का देहावसान हो चुका है. कांग्रेस के जी-23 नेताओं के गुट ने तो सोनिया को चिट्ठी लिखकर ज्वलंत सवाल भी उठाए थे, फिर भी ये लोग पार्टी में बने हुए हैं. पुराना नेता हमेशा नाकारा नहीं होता. 

    पंजाब में अमरिंदर सिंह जैसे सीनियर कांग्रेसी नेता के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद पार्टी की क्या हालत हो रही है, यह सबके सामने है. युवा नेताओं को आगे लाने की कोशिश राहुल गांधी ने की, परंतु ऐसे नेताओं के मन की मुराद पूरी करवा पाना उनके लिए संभव नहीं हो पाया. ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद जब कांग्रेस में हताश हो गए तो बीजेपी में चले गए. सिंधिया केंद्रीय मंत्री हैं तो जितिन प्रसाद को योगी आदित्यनाथ ने उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री बनाया है. केवल सचिन पायलट इस उम्मीद में कांग्रेस में अटके हैं कि कभी न कभी उन्हें न्याय मिलेगा.

    राजस्थान में विधानसभा चुनाव जिताने के बावजूद पायलट को कांग्रेस हाईकमांड ने मुख्यमंत्री नहीं बनाया, बल्कि उनकी बजाय अनुभवी नेता अशोक गहलोत को सीएम पद की बागडोर सौंपी. अब जेएनयू के तेजतर्रार युवा नेता रह चुके कन्हैया कुमार सीपीआई छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हैं. इसी तरह गुजरात के दलित नेता व निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी भी वैचारिक रूप से कांग्रेस से जुड़ गए हैं जो आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ेंगे.

    कन्हैया कुमार से उम्मीद है कि वे बिहार की राजनीति तथा युवाओं को प्रभावित करेंगे. जिग्नेश मेवाणी गुजरात के युवाओं व दलितों को कांग्रेस से जोड़ सकते हैं. हार्दिक पटेल के पाटीदार आंदोलन में जिग्नेश मेवाणी ने उनका साथ दिया था. राहुल गांधी ने कुछ सोचकर इन युवा नेताओं को साथ लिया है. ये कितने उपयोगी साबित होते हैं, यह तो वक्त ही बताएगा.