बेफिक्र नेतृत्व पर भड़के सिब्बल कांग्रेस को अब गंभीरता से लेना होगा

कांग्रेस( Congress) का पुराना किला खंडहर बनता चला जा रहा है लेकिन पार्टी का नेतृत्व इसे लेकर पूरी तरह बेफिक्र है. शीर्ष पर देखी जा रही लापरवाही और उदासीनता का नतीजा सामने दिखाई दे रहा है. न तो किसी से सलाह ली जा रही है, न खुद कोई सार्थक पहल की जा रही है. कोई सचेत करने की कोशिश करे तो उसे अनुशासनहीन और बागी मान लिया जाता है. लगता है कि महात्मा गांधी के 3 बंदरों के समान पार्टी नेतृत्व ने भी अपने मुंह, कान और आंख बंद कर लिए हैं. न कुछ देखना है, न सुनना है और न बोलना है.

कांग्रेस के 23 नेताओं ने पिछली बार खुला पत्र लिखा था तो पार्टी नेतृत्व ने उस पर एतराज जताया था कि मीडिया में यह बातें क्यों जा रही हैं? अब फिर कपिल सिब्बल ने सोनिया या राहुल से सीधे बात करने की बजाय मीडिया के सामने अपनी राय रख दी, जिस पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok gehlot)ने आपत्ति जताई. वस्तुत: कांग्रेस की हालत उस मोर के समान हो गई है जो अपने पंखों की खूबसूरती देखकर आत्ममुग्ध होता है लेकिन अपने पैरों की कुरूपता देखना नहीं चाहता. इस पार्टी में आत्मचिंतन या आत्मावलोकन की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है. कांग्रेस के पत्र लिखने वाले 23 नेताओं में से एक प्रमुख नेता कपिल सिब्बल ने पुन: बिना किसी का नाम लिए पार्टी नेतृत्व की दिशाहीनता पर सवाल उठाया है. कानून के गहरे जानकार और कितने ही मामलों में कांग्रेस नेतृत्व के वकील कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) दोटूक कहने का साहस रखते हैं तो यह सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए नहीं है. उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए.

क्या पराजय को नियति मान लिया

बिहार विधानसभा चुनाव तथा 11 राज्यों की 59 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के घटिया प्रदर्शन पर सिब्बल ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि पार्टी ने शायद हर चुनाव में हार की अपनी नियति मान लिया है. इससे कार्यकर्ताओं की भावनाएं आहत होती हैं. बिहार के चुनाव व दूसरे राज्यों के उपचुनाव में कांग्रेस के कामकाज या परफॉर्मेंस पर टॉप लीडरशिप की राय अब तक सामने नहीं आई है. पार्टी ने पिछले 6 वर्षों में आत्ममंथन नहीं किया तो अब इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं? हमें अपनी कमजोरियां पता हैं. समाधान के बारे में भी जानते हैं लेकिन इसे अपनाना नहीं चाहते. कपिल सिब्बल ने चेतावनी दी कि जनता कांग्रेस को प्रभावी विकल्प नहीं मानती. कांग्रेस को मिली पराजय का असर अगले वर्ष होने वाले बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी व असम के विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है. कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी कपिल सिब्बल के बयान को लेकर कहा कि यह कांग्रेस के लिए आत्मविश्लेषण, चिंतन और विचार-विमर्श का समय है. जनता अब कांग्रेस को विकल्प मानने में संकोच कर रही है. कांग्रेस को सोचना चाहिए कि जनता उससे क्यों विमुख हो रही है.

भुनभुनाहट तो होगी ही

ये बातें कोई भड़ास नहीं हैं, यह वस्तुस्थिति को इंगित करती हैं. जीत के सभी साथी होते हैं. पार्टी लगातार हारती चली जाए तो भुनभुनाहट शुरू हो जाती है. सत्ताविहीन हो जाने से पार्टी में व्याप्त बेचैनी व छटपटाहट छुपेगी भी तो कैसे? सोनिया और राहुल को यह सब सुनना होगा. क्या यह सच नहीं है कि यूपी के चुनाव के बाद से प्रियंका गांधी राजनीतिक परिदृश्य से लुप्त सी हो गई हैं? कितने आश्चर्य की बात है कि जब बिहार में कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी, तब वहां प्रियंका ने एक रैली तक नहीं की. कांग्रेस सचमुच जोर लगाती तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को सफलता मिल सकती थी. सोनिया स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रही हैं. राहुल फुल टाइम नेतृत्व देने की भूमिका में नहीं हैं.

आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी ने तीखे शब्दों में कहा कि जब बिहार में चुनाव अपने पूरे शबाब पर था तब राहुल गांधी शिमला में प्रियंका गांधी के फार्महाउस पर पिकनिक मना रहे थे. क्या यह कांग्रेस की दिशाहीनता नहीं है? क्या पार्टी यह समझती है कि बगैर प्रयास किए जीत उसकी झोली में आ टपकेगी? पार्टी को कर्मठ होना चाहिए परंतु लगता है वह भाग्यवादी बनकर रह गई है. इसीलिए सिब्बल ने कहा कि कांग्रेस ने पराजय को अपनी नियति मान लिया है. बीजेपी के विजय-रथ को रोकना है तो कांग्रेस को अपनी न्यूनताओं को दूर कर समर्थ और संगठित नेतृत्व देना होगा.