लोजपा में फूट पड़ी, पासवान के चिराग को बुझाने में लगे चाचा

    राजनीति में चाचा-भतीजे का झगड़ा यूपी में शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच देखने को मिला था. अब बिहार में भी चिराग पासवान व उनके चाचा पशुपति पारस के बीच जबरदस्त राजनीतिक टकराव चल रहा है. पार्टी पर पशुपति का वर्चस्व हो गया है. लोजपा में हुई हलचलों के पीछे नीतीश कुमार की कूटनीति नजर आती है. चिराग पासवान पार्टी में जान फूंकने में विफल रहे. बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान लोजपा नेता रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद उनके बेटे चिराग पासवान ने पार्टी का नेतृत्व संभाल लिया था. चिराग को भारी विफलता झेलनी पड़ी क्योंकि एनडीए गठबंधन से अलग चुनाव लड़ने का फैसला लोजपा को ले डूबा और पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल पाई.

    चिराग के नेतृत्व से हताश होकर लोजपा के 5 सांसदों ने उनसे दूरी बना ली. चिराग पासवान इन सांसदों को मनाने में जुट गए हैं. वास्तविकता यह है कि लोक जनशक्ति पार्टी पर अब चिराग के चाचा पशुपति पारस का वर्चस्व हो गया है. जब चिराग पासवान पशुपति पारस से मिलने दिल्ली स्थित उनके आवास पर पहुंचे तो उनके लिए 20 मिनट तक गेट नहीं खोला गया. यह चिराग को करारा झटका था. लोजपा के 5 सांसदों ने पशुपति को अपना नेता चुना है. इन सांसदों में नवादा के चंदन कुमार, समस्तीपुर के प्रिंस पासवान, खगड़िया के महबूब अली कैसर और वैशाली की वीणा देवी शामिल हैं. ये सभी चिराग पासवान के कामकाज से खुश नहीं थे. पशुपति पारस इन सांसदों को साथ लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिले. लोकसभा सचिवालय को पशुपति पारस के नेता चुने जाने का पत्र मिला है. सारे कानूनी पहलुओं की जांच के बाद सचिवालय किसी निर्णय पर पहुंचेगा.

    पार्टी नहीं तोड़ने का दावा

    पशुपति पारस ने कहा कि चिराग मेरा भतीजा व पार्टी अध्यक्ष है. मेरा उससे कोई विरोध नहीं है लेकिन हमारी पार्टी के 6 में से 5 सांसद पार्टी को बचाना चाहते हैं. यह कहना गलत है कि मैंने पार्टी तोड़ी. लोजपा हमारी पार्टी है और बिहार में हमारा संगठन काफी मजबूत है. लोजपा केंद्र में एनडीए के साथ है और यह गठबंधन आगे भी जारी रहेगा. पशुपतिकुमार पारस ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्वों ने हमारी पार्टी में सेंध लगाई और 99 फीसदी कार्यकर्ताओं की भावना की अनदेखी कर गठबंधन को तोड़ दिया था, जिससे लोक जनशक्ति पार्टी बिखर रही थी. चिराग ने विधानसभा चुनाव के समय नीतीश कुमार को टक्कर देने के उद्देश्य से अपने उम्मीदवार अलग से उतारे. यह फैसला उन्हें भारी पड़ा और इससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा था.