भाषायी भेदभाव पर फिर उत्तर-दक्षिण भारत में टकराव

दक्षिण भारत का हिंदी (Hindi)विरोध राजनीतिक किस्म का है. अपनी राजनीति की रोटी सेंकने के लिए ही वहां के नेता समय-समय पर इसे हवा देते रहते हैं और आम जनता को भड़काने का काम करते हैं. यह निहायत ओछापन है. राष्ट्रभाषा और समूचे देश की सामर्थ्यवान संपर्क भाषा हिंदी के साथ ऐसा दुराव रखना ठीक नहीं है. एम. करुणानिधि (M. Karunanidhi) के हिंदी विरोध से सभी परिचित रहे हैं. अब उनकी बेटी व डीएमके सांसद कनिमोझी ने एक मामूली सी बात को तूल देते हुए हिंदी पर निशाना साधा है. आश्चर्य की बात है कि पी चिदम्बरम (P Chidambaram)और जदसे नेता एचडी कुमारस्वामी ने भी भाषा विवाद की आग में घी डालने का काम किया है जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी. कनिमोझी के अनुसार जब उन्होंने एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ अधिकारी से कहा कि वह उनसे अंग्रेजी या तमिल में बात करे तो उसने पलटकर पूछा- क्या आपको हिंदी आती है, क्या आप भारतीय हैं? कनिमोझी की शिकायत के बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए सीआईएसएफ ने तुरंत जांच के आदेश दे दिए और स्पष्ट किया कि भाषा के आधार पर कोई उंगली उठाना नीति के खिलाफ है. वस्तुत: अधिकारी ने एक सांसद से अपनी सीमा से बाहर जाकर बात की और यह तो बिल्कुल भी नहीं पूछना चाहिए था कि क्या आप भारतीय हैं? भारत में सभी भाषाओं को सम्मान का दर्जा दिया गया है, इसलिए हिंदी नहीं जानने वाला व्यक्ति अभारतीय नहीं हो जाता. इतने पर भी सभी नेताओं को समझना चाहिए कि हिंदी समन्वय व एकात्मता की भाषा है. उसका क्षेत्रीय भाषाओं से कभी कोई विरोध नहीं रहा. यह बात सभी को समझ लेनी चाहिए कि हिंदी समर्थकों ने आंदोलन किए भी तो अंग्रेजी के विरोध में!

चिदम्बरम व कुमारस्वामी भी कूद पड़े

पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता पी चिदंबरम  (P Chidambaram) ने कनिमोझी प्रकरण का आधार लेकर अपना रोना रोया. उन्होंने कहा कि कनिमोझी के साथ हुई घटना कोई नई बात नहीं है, मैंने खुद कई सरकारी अधिकारियों और आम लोगों के तंज सहे हैं. वे चाहते हैं कि फोन पर या कई बार आमने-सामने भी मैं हिंदी में बात करूं. चिदम्बरम के बेटे कार्ति ने कहा कि यह बहुत निंदनीय है. अभी भाषा का टेस्ट हो रहा है, आगे क्या होगा? चिदम्बरम चाहे कुछ भी कहें लेकिन इतने वर्ष दिल्ली में रहने के बाद भी क्या उन्होंने हिंदी नहीं सीखी? क्या संसद में दिए जाने वाले कितने ही नेताओं के हिंदी भाषण उन्हें बिल्कुल भी समझ में नहीं आते थे या वे जानबूझकर ढोंग कर रहे हैं? जब चिदम्बरम की पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी मातृभाषा इटालियन रहने पर भी अच्छी हिंदी बोल लेती हैं और हिंदी में भाषण देती हैं तो चिदम्बरम को हिंदी से अरुचि क्यों है? उन्हें हिंदी इतनी ही अस्वीकार्य लगती है तो तमिलनाडु की राजनीति तक ही सीमित रहना था, केंद्र की राजनीति में क्यों आए? हिंदी जैसी लोकप्रिय संपर्क भाषा को लेकर उनकी टिप्पणी अशोभनीय ही कही जाएगी. इसी तरह कुमारस्वामी ने कहा कि हिंदी पालिटिक्स ने दक्षिण भारत के कई नेताओं को प्रधानमंत्री बनने से रोका. क्या कुमारस्वामी भूल गए कि उनके पिता एचडी देवगौड़ा और पीवी नरसिंहराव दक्षिण भारत के ऐसे नेता थे जो पीएम बने थे. नरसिंहराव हिंदी, अंग्रेजी सहित 18 देशी-विदेशी भाषाओं के जानकार थे. उन्होंने पूरे 5 वर्ष प्रधानमंत्री पद संभाला. कुमारस्वामी का यह कहना गलत है कि हिंदी पॉलिटिक्स के कारण स्वतंत्रता दिवस पर देवगौड़ा को हिंदी में भाषण देना पड़ा. तथ्य यह है कि उन्होंने कन्नड़ में भाषण दिया था और उनके मंत्री सीएम इब्राहिम उसका हिंदी अनुवाद करते चले गए. कुमारस्वामी ने के. कामराज का उल्लेख किया जो काफी प्रभावशाली कांग्रेस अध्यक्ष थे और इंदिरा गांधी को पीएम बनाने के पीछे के. कामराज और डीपी मिश्रा ने पूरा जोर लगाया था. इस तरह के. कामराज की भूमिका राजनीति में किंगमेकर वाली रही. उनका एक तमिल जुमला था- ‘पर्कलाम’ अर्थात देखा जाएगा.

कुछ नेता खुद पीछे हटे

जब जनता दल बना था तब बंगाल के सीएम व वरिष्ठ सीपीएम नेता ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव था लेकिन ज्योति बसु को उनकी पार्टी सीपीएम ने मना कर दिया. साथ ही हिंदी भाषण देने की क्षमता नहीं होने से भी ज्योति बसु पीछे हट गए.

हिंदी विरोध सिर्फ बनावटी

जब वैजयंती माला, पद्मिनी, हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी, जयाप्रदा, विद्या बालन, दीपिका पादुकोन जैसी कितनी ही दक्षिण भारतीय हीरोइनों ने हिंदी फिल्मों में अभिनय कर लोकप्रियता हासिल की तो हिंदी विरोध की बात कहीं ठहरती ही नहीं है. केरल के कितने ही लोग दिल्ली और विदेश में काम करते हैं और हिंदी बोलते हैं. दक्षिण भारत के कितने ही आईएएस व आईपीएस अधिकारी बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं, उन्हें तो हिंदी सीखने में कोई दिक्कत नहीं आई. इसलिए हिंदी विरोध सरासर बनावटी व राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित है.