मूषक बड़े चालाक और खुदगर्ज चूहों को पकड़ने में लाखों का खर्च

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पड़ोसी ने हमसे कहा, “निशानेबाज, हैं कि उन्हें पकड़ने के लिए रेलवे को 69 लाख रुपए खर्च करने पड़े. 3 वर्ष में केवल 168 चूहे पकड़े गए. हर चूहे को पकड़ने पर रेलवे का 41,000 रुपया खर्च हुआ. इसे आप चूहा घोटाला कदापि मत कहिएगा.” 

हमने कहा, “हम ऐसा कुछ भी नहीं कह रहे हैं. चूहा गणेशजी का वाहन होता है. हम उसे पूरा-पूरा महत्व दे रहे हैं. गणेशजी अपना मोदक चूहे से शेयर करते हैं. इसके बावजूद चूहा हर चीज कुतर डालता है. हर दूकानदार चूहों से आतंकित रहता है. गोदामों में रखा अनाज चूहे चट कर जाते हैं. बिहार में तो चूहे पुलिस मालखाने में रखी हजारों लीटर शराब भी गटक गए थे. शायद सरकारी दफ्तरों में रखी घोटालों से संबंधित फाइलें भी चूहे कुतर डालते होंगे ताकि सबूत गायब हो जाए.”

 पड़ोसी ने कहा, “निशानेबाज, चूहों के आतंकवाद से रेलवे परेशान है. ये बड़े-बड़े बिल बनाकर पटरी के नीचे की जमीन खोखली कर देते हैं. इनकी वजह से कई बार सिग्नलिंग सिस्टम को नुकसान पहुंचता है. जरा सोचिए कि सिग्नलमूषकराज रुको।

ठीक से काम न करे तो ट्रेन एक्सीडेंट हो सकता है. इतना ही नहीं, ट्रेनों के कोच में आए दिन चूहा, मच्छर, काकरोच की शिकायतें मिलती रहती हैं. चूहा खाद्य सामग्री और बरतनों में गंदगी भी फैला सकता है.” 

हमने कहा, “चूहे को पकड़ने के लिए चूहेदानी या माउसट्रैप रखा जाता है लेकिन चालाक चूहे उसमें भी नहीं फंसते. यदि रेल विभाग ढेर सारी बिल्लियां पालता तो वे चूहों का सफाया कर देतीं. वैसे रेलवे को अलग बजट बनाकर बिल्लियों के लिए दूध का इंतजाम भी करना पड़ता. आपने सवेरा फिल्म का बालगीत सुना होगा- छुपाछुपी एलो छुपी, आगड़-बागड़ जाई रे, चूहे मामा ओ मामा भाग बिल्ली आई रे ! बच्चों को टॉम एंड जेरी कार्टून भी बेहद पसंद है. जिसमें चालाक चूहा टॉम नामक बिल्ले को खूब छकाता है और कभी उसकी पकड़ में नहीं आता. कहावत है कि चूहा बिल बनाता है और सांप उसमें रहने चला जाता है. वैसे गणेशजी का चूहा और शंकरजी के गले का नाग दोनों शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के साथ रहते हैं. चूहे को लेकर किशोरकुमार और नूतन की पुरानी फिल्म ‘दिल्ली का ठग’ का गीत है- सीएटी कैट, कैट माने बिल्ली, आरएटी रैट, रैट माने चूहा, दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ ! “