nishanebaaz Planning would have remained incomplete by bringing stay, nitin Gadkari's helplessness in highway construction

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पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, आपको फिल्म रोटी, कपडा और मकान का गीत याद होगा- हाय-हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी, मुझे पल-पल ये तड़पाए, तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए. इस गीत में उस मजबूर प्रेमिका की वेदना झलकती है जिसका प्रेमी अपनी नौकरी की वजह से उससे दूर है.’’

हमने कहा, ‘‘इस समय किसी प्रेमिका की नहीं बल्कि केंद्रीय बूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की मजबूरी को समझना कही ज्यादा महत्वपूर्ण है. वे दिल्ली-जयपुर हाईवे एनएच-48 पर एक जगह ‘मजबूरी’ का बोर्ड लगवाने जा रहे हैं.’’

पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, गडकरी जैसे कर्मठ मंत्री की क्या मजबूरी हो सकती है? उनके निर्माण कायर्यों को देखकर लोग उन्हें रोडकरी कहते हैं. जब वे महाराष्ट्र में मंत्री थे तब भी उन्होंने मुंबई में दर्जनों उड़ानपुल या फ्लाईओवर बनाए थे. ढीले और निकम्मे अधिकारियों को गडकरी डांट-फटकार कर काम से लगा देते हैं. देश में अमेरिका जैसी सड़कें बनाने में जमे इस मंत्री की कौन सी विवशता हो सकती है?’’

हमने कहा, ‘‘चीन में जब निर्माण कार्य होता है तो उसमें कोई रुकावट नहीं आती लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में कोर्ट से स्टे आर्डर लाकर कोई भी प्रोजेक्ट बीच में ही आधा अधूरा रोक दिया जाता है. निर्माण कार्य रुक जाए तो जनता सरकार और मंत्री को इसकेलिए जिम्मेदार मान लेती है. गडकरी ने एसोचैन के एक कार्यक्रम में कहा कि हिंदुस्तान ऐसा देश है जहां काम करो, ऐसा कहने के लिए कोई नहीं आता. कहा जाता है- काम बंद करो, काम स्टे करो. दिल्ली-जयपुर में लोग रोज मुझे गालियां देते हैं जबकि स्टे अदालत ने लगाया है. मैंने अपने अधिकारियों से कह दिया है कि वहां बोर्ड लगा दो कि हाईकोर्ट ने इस काम के टेंडर को स्टे दिया है. इसलिए जनता को जो तकलीफ हो रही है, उसके लिए हम एनएफएआई की तरफ से आपसे क्षमा मांगते हैं.’’

पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, स्थगनादेश की वह से गडकरी की मजबूरी समझ में आती है. विपरीत परिस्थितियां इंसान को हमेशा मजबूर कर देती हैं. मजबूरी को लेकर हमें गीत याद आता है- होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा, जहर चुपके से दवा जान के खाया होगा.’’