ज्वलंत समस्याओं को छिपाने, सावरकर को ‘हवा’

  • राजनाथ का ज्ञान

विनायक दामोदर सावरकर के विचार इतने तीखे थे कि आरएसएस भी उन्हें नहीं पचा पाया. डा. हेडगेवार, गोलवलकर, देवरस, रज्जू भैया, सुदर्शन जैसे किसी भी संघ प्रमुख ने सावरकर का गुणगान नहीं किया. सावरकर सिर्फ हिंदू महासभा जैसे संगठन के लिए स्वीकार्य थे. इसके बावजूद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को जाने क्या सूझी कि उन्होंने अचानक सावरकर का महिमामंडन किया और इसी बहाने महात्मा गांधी पर दोषारोपण कर डाला. यह एक सोची समझी चाल दिखाई देती है जिसका उद्देश्य महात्मा गांधी को नीचा दिखाना और सावरकर को महिमामंडित करना है. इसके पीछे संघ व बीजेपी का एजेंडा दिखाई देता है.

राजनाथ सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी के कहने पर ही सावरकर ने अंग्रेजों को मर्सी पिटीशन या दया याचिका लिखी थी. यह तथ्य भुला दिया गया कि सावरकर इसके पहले भी दया याचिका दायर कर चुके थे. स्वाधीनता आंदोलन के तारतरीकों को लेकर गांधी और सावरकर के विचार बिल्कुल विपरीत थे. ऐसे में गांधी क्यों सावरकर से मर्सी पिटीशन लिखवाएंगे. सावरकर सशस्त्र क्रांति के समर्थक थे जबकि महात्मा गांधी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते थे. बताया जाता है कि 1909 में गांधी की लंदन के इंडिया हाउस में सावरकर से मुलाकात हुई थी. उस समय कांग्रेस के बड़े नेता लोकमान्य तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपतराय थे. कांग्रेस को गांधी का नेतृत्व 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन से मिला. 1927 में जब सावरकर रत्नागिरी जिले में नजरबंद थे तब गांधी उनसे मिलने उनके घर गए थे. इतने पर भी दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद कायम रहे.

सावरकर को अंग्रेजों ने कालापानी की सजा देकर अंदमान-निकोबार के सेल्युलर जेल भेजा था. जहां उन्हें छोटी सी तंग कोठी में रखा गया और कोल्हू चलाकर तेल निकालने की सजा दी गई. उन्होंने काफी यातनाएं सहीं. बाद में जब कांग्रेस का नेतृत्व गांधी के हाथो में आ गया तो सावरकर माफी मांगकर जेल से छूटे. नेशनल आर्कीब्ज (राष्ट्रीय संग्रहालय) के दस्तावेजों के अनुसार सावरकर और उनके 4 साथियों ने ब्रिटिश वाइसराय को अपनी रिहाई के लिए जो पत्र भेजा था उस पर गवर्नर जनरल के विशेष अधिकारी रेजिनाल्ड क्रेडोक ने लिखा था कि सावरकर झूठा अफसोस जाहिर कर रहा है. वह जेल से छूटकर यूरोप के टेररिस्ट से हाथ मिलाएगा और सावरकर को उलटने की कोशिश करेगा. सावरकर के सशस्त्र क्रांति के विचार से अंग्रेज आशंकित थे.

सावरकर के कितने ही विचार संघ को पच नहीं सकते. सावरकर गाय को सिर्फ एक जानवर मानते थे और गोहत्या के विरोधी नहीं थे. यह विचार संघ व बीजेपी को हजम नहीं हो सकता क्योंकि कथित गोरक्षकों द्वारा पीट-पीटकर अल्पसंख्यकों की हत्या किए जाने की घटनाओं को उनका खुला समर्थन था. सावरकर ने हिंदू-मुसलमानों के समान अधिकार की बात कही थी. उन्होंने अपनी किताब ‘1957 का स्वातंत्र्य समर’ में आखिरी मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर अवध की बेगमो और मुस्लिम फौजियो की बहादुरी का वर्णन किया था. बीजेपी और मुस्लिम फौजियो की बहादुरी का वर्णन किया था. बीजेपी और संघ प्राचीन भारतीय संस्कृति की विरासत का उल्लेख करते हुए मुस्लिमों का मुद्दा टालते हैं. वे केवल यही कहते हैं कि भारत में रहनेवाले मुस्लिमो के पूर्वज हिंदू ही थे. इतने दशकों तक संघ ने सावरकर को परे रखा और अब उनसे प्रेम जताया जा रहा है. उद्देश्य एक ही प्रतीत होता है कि सधे हुए प्रयासों से गांधी को खारिज कर सावरकर का कद ऊंचा उठाया जाए. इसी लिहाज से राजनाथ सिंह सावरकर की नई कथा रच रहे हैं.