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    आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं को पालने-पोसने वाले पाकिस्तान की हकीकत दुनिया के सामने है. इंटरनेशनल फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने फैसला किया कि पाकिस्तान उसकी ग्रे लिस्ट में ही रहेगा. यह आर्थिक संकट से जूझ रहे पाक को बड़ा झटका है. एफएटीएफ की रिपोर्ट के मुताबिक पाक ने 27 एक्शन (कार्य बिंदुओं) में से अभी 26 को ही पूरा किया है. बाकी बचे एक बिंदु को लागू करने में उसे 2 से 3 महीने और लगेंगे. ग्रे लिस्ट में रखे जाने से पाक को 2008 से 2019 तक करीब 38 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है.

    उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक से मदद नहीं मिल पा रही है. एफएटीएफ के इस सख्त फैसले से पाकिस्तान बौखला गया है. वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इसे राजनीतिक पक्षपात व पश्चिमी देशों का भेदभाव बताया. पाकिस्तान के वित्तीय सौदों की लागत बढ़ गई है तथा उसे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मदद भी नहीं मिल पा रही है. पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान से जुड़ी अपनी विदेश नीति को आगे बढ़ाने में आतंकवाद का इस्तेमाल करता आया है. एफएटीएफ चाहता है कि पाकिस्तान यूएन द्वारा घोषित आतंकी संगठनों के सरगनाओं की जांच करे, उन पर मुकदमा चलाए व सजा दे.

    इन आतंकी संगठनों में अफगान तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए तैयबा व जैश-ए-मोहम्मद का समावेश है. इनमें शुरू के 2 संगठन अफगानिस्तान के तथा बाद के 2 संगठन भारत के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं. पाकिस्तान की सेना व खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से ये आतंकी संगठन सक्रिय हैं. पाकिस्तान ने दिखावे के तौर पर कुछ आतंकी संगठन प्रमुखों पर कार्रवाई की है परंतु कोई निर्णायक ठोस कदम नहीं उठाया. एफएटीएफ चाहता है कि पाकिस्तान इस मामले में और सख्ती दिखाए तथा मनी लांड्रिंग रोके. पाक को चीन का समर्थन तो है लेकिन पश्चिमी देश उसके रंग-ढंग भली भांति जानते हैं कि वह किस तरह दुनिया की आंखों में धूल झोंकता है.