खतरे में पड़ी इमरान की कुर्सी

पाकिस्तान में लोकतंत्र (Pakistan Political Crisis) की जड़ें कभी जम ही नहीं पाईं. जब कभी भी वहां निर्वाचित सरकारें आईं, बेहद ढुलमुल हालत में रहीं और अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं. इसकी एक बड़ी वजह यह भी रही कि पाकिस्तान (Pakistan) की फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई का दबाव-प्रभाव इतना जबरदस्त है कि निर्वाचित सरकार को उनके इशारों पर चलना पड़ता है. यदि किसी प्रधानमंत्री ने फौज की कठपुतली बनना स्वीकार नहीं किया तो उसका तख्ता पलट होते देर नहीं लगती. राजनीतिक अस्थिरता को खत्म करने और मुल्क को बचाने के नाम पर वहां फौजी तानाशाह सत्ता हथियाते रहे हैं. अयूब खान, याहया खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ(Pervez musharraf) जैसे जनरल यही तो करते आए. अब इमरान खान की सरकार डांवाडोल है. यद्यपि इमरान ने सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा को रिटायर होने न देकर 3 वर्ष का सेवा विस्तार दिया लेकिन फिर भी कोई आश्चर्य नहीं कि यही बाजवा कभी इमरान का बैंड बजा दें! सेवा विस्तार देने के पीछे बाजवा का ही दबाव रहा होगा. भुट्टो ने भी तो 9वें नंबर के जूनियर जनरल जिया उल हक को सेना प्रमुख बनाया था, लेकिन उसी ने भुट्टो को फांसी पर लटका दिया था.

इमरान खान क्रिकेट कप्तान रहने के बाद राजनीति में आए. पाकिस्तान की समस्याओं का उनके पास कोई समाधान नहीं है. मुल्क में बेहद गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, पिछड़ापन व कट्टरता है. पाकिस्तान पर विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और सऊदी अरब के कर्ज का भारी बोझ लदा हुआ है. कितने ही दशकों तक अमेरिका पाकिस्तान को पालता रहा इसलिए वहां सब कुछ विदेश से आता था. यह देश कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया. वहां कोई औद्योगिक विकास नहीं हुआ. पहले वह अमेरिका से खैरात लेता रहा और अब चीन उसे पाल रहा है. इमरान खान अपने पूर्ववर्ती शासकों के समान पाकिस्तान की आंतरिक समस्याओं से लोगों का ध्यान बटाने के लिए कश्मीर मुद्दे को उछालते रहते हैं और भारत विरोध की घटिया राजनीति करते रहते हैं. उनकी नीतियों से पाकिस्तान में असंतोष बढ़ा. अमेरिका से भी पाकिस्तान को उपेक्षा मिल रही है. दोस्ती के आड़ में चीन अपना दबाव बढ़ाता चला जा रहा है और पाकिस्तान चीन का गुलाम बनकर रह गया है.

11 विपक्षी पार्टियों की ललकार

इमरान खान के खिलाफ सारा विपक्ष एक हो गया है. 11 विपक्षी पार्टियों के गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) ने इमरान खान की सरकार को 31 जनवरी तक इस्तीफा देकर सत्ता से हटने का अल्टीमेटम दे दिया है. संयुक्त विपक्ष का नेतृत्व कर रहे जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम (एफ) के नेता मौलाना फजलुर रहमान ने चेतावनी दी कि यदि इमरान सरकार ने विपक्ष की बात नहीं मानी तो विपक्ष लांग मार्च के लिए बाध्य होगा. यह लांग मार्च जनवरी के अंत या फरवरी में इस्लामाबाद की ओर निकाला जाएगा. मौलाना का साथ पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी दे रही है. नवाज शरीफ की बेटी मरियम और पीपीपी के बिलावल भुट्टो जरदारी ने इमरान के खिलाफ मोर्चाबंदी की है. यद्यपि इमरान की सरकार का कार्यकाल 2023 तक है लेकिन विपक्ष उन्हें पद से हटाने पर तुला हुआ है. कोरोना के बावजूद लाहौर में विपक्ष की बड़ी रैली निकाली गई और इसके बाद सिंध के लरकाना में रैली निकालने की तैयारियां जारी हैं. ऐसे टकराव के बीच यदि कोई राजनीतिक सुलह नहीं हुई तो हमेशा की तरह मुल्क को अराजकता से बचाने के नाम पर सेना इमरान खान का तख्ता पलट सकती है. पाकिस्तानी सेना में भी उच्चस्तर पर विचार होने लगा है कि क्या नाकारा साबित हो चुके इमरान खान का कोई विकल्प तलाश लेना चाहिए? फौज और खुफिया एजेंसी की बैठकों में यही मुद्दा गर्म है. पाकिस्तान के उद्योजक और अर्थशास्त्री भी मानने लगे हैं कि इमरान में देश की समस्याओं और चुनौतियों से निपटने की क्षमता नहीं है.

आतंकवाद को निरंतर बढ़ावा

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो चुकी है. वहां आज भी जमींदारी प्रथा है जिसमें किसानों का भारी शोषण किया जाता है. अशिक्षित बेरोजगार नौजवानों को आतंकी संगठन अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते हैं. विश्व के देशों के ध्यान में आ गया है कि पाकिस्तान आतंकवाद का सबसे बड़ा जन्मदाता है. वह एफएटीएफ के रडार पर है जिसने अभी उसे ग्रे सूची में रखा है. मुंबई में हुए 26/11 के आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका दुनिया भर में उजागर हो चुकी है. आतंकवाद को बढ़ावा देने और सीमा पर गोलीबारी करने की उसकी हरकतें कभी न कभी उसे ले डूबेंगी.