पाक से चर्चा की जिद महबूबा का अड़ियल रुख

    पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती का रवैया सचमुच विचित्र है प्रधानमंत्री से चर्चा से पहले ही उन्होंने पाकिस्तान का राग छेड़ कर यह दिखा दिया कि उनके और हुर्रियत कांफ्रेंस के अलगाववादी नेताओं के रुख में कोई अंतर नहीं है. महबूबा ने सवाल किया कि जब भारत सरकार की तालिबान से बात हो सकती है तो पाकिस्तान से क्यों नहीं? यह एक बेतुकी दलील है. तालिबान का मामला अफगानिस्तान से जुड़ा है, भारत से नहीं. अमेरिकी फौजों के लौट जाने के बाद उपमहाद्वीप में शांति स्थापना की जिम्मेदारी को देखते हुए तालिबान से चर्चा करना एक अलग बात है.

    कश्मीर मसले पर पाकिस्तान से चर्चा क्यों की जाए? संविधान से अनुच्छेद 370 हटाना भारत का निजी मामला है. जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने पर विचार करना भी केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए पाकिस्तान को चर्चा में क्यों शामिल किया जाए. पाकिस्तान से यदि कभी चर्चा होगी भी तो इसलिए कि उसने कश्मीर का जो हिस्सा हड़प रखा है, वह पीओ के भारत को लौटाए. दरअसल पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (जीएजीडी) के नेता द्विधा मनस्थिति में हैं. यदि वे प्रधानमंत्री मोदी का चर्चा का निमंत्रण स्वीकार करते हैं तो कुछ लोग उन्हें कमजोर नेता के रूप में देखेंगे. यदि चर्चा नहीं करेंगे तो गुत्थी बनी रहेगी. कश्मीरी नेता अगर अनुच्छेद 370 और 35ए के मुद्दे पर अड़े रहेंगे तो बातचीत आगे नहीं बढ़ पाएगी. बेहतर होगा कि वे केंद्र के साथ बैठक में खुले दिल से मान लें. देश के अन्य राज्यों के समान जम्मू-कश्मीर को दर्जा दिया जाना समय की मांग है.