राहुल-प्रियंका की सक्रियता के बाद भी यूपी में कांग्रेस ने खोई सीट

यदि कांग्रेसजन स्वयं सावधानी नहीं बरतेंगे तथा लापरवाही और निकम्मेपन का परिचय देंगे तो राहुल और प्रियंका (Priyanka gandhi) की सक्रियता भी किस काम आएगी! नेतृत्व दिशा दे सकता है व समुचित मार्गदर्शन कर सकता है लेकिन सजगता तो पार्टीजनों को ही बरतनी होगी. कांग्रेस (Congress seat) के लिए यह जानबूझकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी बात है कि यूपी उपचुनाव (UP election) नतीजों से पहले ही कांग्रेस ने एक सीट गंवा दी. सचमुच अजीब सी बात है कि पार्टी की एक प्रत्याशी को इसलिए मैदान छोड़ना पड़ा क्योंकि उसका नामांकन पर्चा ही खारिज हो गया था. फिरोजाबाद जिले की टूंडला सीट से चुनाव लड़ रहीं कांग्रेस उम्मीदवार स्नेहलता का पर्चा इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि उनका शपथपत्र अधूरा था.

उन्होंने अपने हलफनामे में वह सब जानकारी नहीं दी जिसकी आवश्यकता चुनाव आयोग को होती है. नियम यह है कि शपथपत्र का कोई भी कॉलम खाली नहीं छोड़ा जाना चाहिए. स्नेहलता ने अपने आश्रित परिवारजनों के नाम का कॉलम खाली छोड़ दिया था. इतना ही नहीं, इसके अलावा भी और कई जगहों पर जानकारी न देते हुए ब्लैंक छोड़ दिया. अपनी इस गलती के बावजूद स्नेहलता ने फिरोजाबाद जिला प्रशासन पर बेईमानी के आरोप लगाए व कहा कि 14 अक्टूबर को दाखिल नामांकन पत्र में कुछ कमियां थीं लेकिन 16 अक्टूबर को उसे दुरुस्त कर दिया था. उन्होंने दावा किया कि वे टूंडला सीट से चुनाव जीतने वाली थीं क्योंकि एकमात्र वही स्थानीय उम्मीदवार थीं, जबकि बाकी सारे प्रत्याशी बाहरी हैं. उन्होंने रिटर्निंग ऑफिसर पर शपथपत्र के पन्ने बदलने का आरोप लगाया. दूसरी ओर जिला प्रशासन ने इस बारे में सफाई दी.

रिटर्निंग ऑफिसर ने कहा कि स्नेहलता को 3 बार बुलाकर बताया गया कि उनका पर्चा अधूरा है लेकिन हर बार उसे भरते हुए उन्होंने कुछ कॉलम खाली छोड़ दिए. सारे घटनाक्रम की वीडियोग्रॉफी कराई गई तथा किसी भी तरह की गड़बड़ी की कोई संभावना नहीं है. यदि स्नेहलता के दावे में दम होता तो वे कोर्ट में चुनौती देतीं लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया. जाहिर है कि गलती उन्होंने ही की थी और उनकी चूक पार्टी को महंगी पड़ गई. बगैर चुनाव लड़े एक सीट खो देना कांग्रेस के लिए किसी सदमे से कम नहीं है. नामांकन पत्र की कई प्रतियां होती हैं और उन्हें सावधानी से पूरी तरह भरना होता है. कहीं गलती न रह जाए, इसलिए प्रत्याशी सावधानी के तौर पर एक से ज्यादा पर्चे के सेट्स दाखिल करते हैं. प्रत्याशी की लापरवाही का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा.