पासवान के निधन से लोजपा को चुनाव में सहानुभूति या चिराग को झटका

लोजपा नेता व रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे 1989 से 2020 तक प्राय: सभी सरकारों में रहे तथा केवल कुछ समय के लिए ही सत्ता से दूर रहे. वे वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल, अटलबिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोद जैसे 6 प्रधानमंत्रियों के मंत्रिमंडल के सदस्य रहे. वे कभी यूपीए तो कभी एनडीए में रहे. एक बार लालूप्रसाद यादव ने कहा था कि पासवान चुनावी मौसम के वैज्ञानिक हैं. उन्हें पहले ही आभास हो जाता है कि चुनाव में किस पार्टी या गठबंधन की जीत होने वाली है. दलित राजनीति के बड़े चेहरे होने की वजह से उनका केंद्र में काफी प्रभाव था. वीपी सिंह की सरकार में समाज कल्याण मंत्री रहते हुए भारी विरोध के बावजूद मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना पासवान की बड़ी उपलब्धि थी. 2002 के गुजरात दंगों के विरोध में उन्होंने वाजपेयी सरकार छोड़ दी थी तो सोनिया गांधी ने उन्हें यूपीए में शामिल कर लिया था. जब पासवान फिर एनडीए में वापस आए तो मोदी सरकार में उन्हें मंत्री बना लिया गया. ऐसी खूबी बहुत कम नेताओं में होती है. रामविलास पासवान अपने बेटे चिराग को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल कराना चाहते थे परंतु प्रधानमंत्री ने रामविलास के ही मंत्री बनने पर जोर दिया था.

अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने वाले चिराग पासवान को बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar election) में सहानुभूति लहर के चलते लाभ होगा अथवा जनता उन्हें झटका देगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. चिराग लगातार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तीखी आलोचना कर रहे हैं. अजीब सी स्थिति है कि लोजपा केंद्र में एनडीए सरकार की सहयोगी बनी हुई है जबकि बिहार के चुनाव में उसके उम्मीदवार जदयू के खिलाफ हर सीट पर लड़ेंगे. रामविलास पासवान का निधन ऐन बिहार चुनाव के पहले हुआ है, इसलिए सहानुभूति लहर का फायदा चिराग पासवान को मिलना स्वाभाविक है. इससे कई जिलों में राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकते हैं. सबसे ज्यादा असर जदयू पर पड़ सकता है क्योंकि जगजीवन राम के बाद रामविलास पासवान ही दलितों के बड़े नेता थे. लोकसभा में पहले ही बिहार की सुरक्षित सीटों पर पासवान परिवार का कब्जा है. लोकसभा में लोजपा के 6 सांसदों में पासवान के 2 भाई और बेटा चिराग शामिल है.

5 जिलों में हो सकता है जदयू को नुकसान

बिहार के 5 जिलों- समस्तीपुर, खगड़िया, जमुई, वैशाली और नालंदा में पासवान परिवार का दबदबा है. पासवान को अगड़ी जातियों के लोग भी पसंद करते हैं क्योंकि उन्होंने कभी भी विवादित या भड़काने वाला बयान नहीं दिया. समस्तीपुर से रामविलास पासवान के भतीजे प्रिंस राज सांसद हैं. इस क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें हैं. हाजीपुर से रामविलास के भाई पशुपति कुमार पारस सांसद हैं. इस जिले में 3,50,000 से ज्यादा दलित वोटर हैं. वहां 7 विधानसभा सीटें हैं. खगड़िया जिले में रामविलास पासवान का घर है जहां लगभग 4,00,000 दलित वोटर हैं. जमुई जिले से चिराग पासवान सांसद हैं. उनके क्षेत्र में 6 विधानसभा क्षेत्र आते हैं. माना जाता है कि इस चुनाव में चिराग सहानुभूति कार्ड खेलने की कोशिश करेंगे.

नीतीश कुमार की रणनीति

बिहार के सीएम व जदयू नेता नीतीश कुमार ने दलित वोटों में सेंधमारी के लिए बड़ा खेल किया था. 2005 के चुनाव में लोजपा ने नीतीश का साथ नहीं दिया था. इसका बदला भुनाने के लिए नीतीश ने 22 में से 21 दलित जातियों को महादलित घोषित कर दिया था. उन्होंने महादलितों में पासवान की जाति को शामिल नहीं किया था. यह दलितों में फूट डालने की राजनीतिक चाल थी. चिराग पासवान की कोशिश महादलितों के वोट लेने की भी है. नीतीश कुमार भी चिराग पासवान व लोजपा पर सीधे वार करने से बचेंगे.

BJP का लोजपा के प्रति कैसा रुख

लोजपा बिहार में एनडीए से अलग है. चिराग पासवान ने घोषणा की है कि हम बीजेपी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेंगे. वहीं बीजेपी नेताओं ने कहा कि चिराग प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर का चुनाव प्रचार में इस्तेमाल नहीं कर सकते. इसी बीच रामविलास पासवान का निधन हो गया. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ट्वीट किया कि मोदी सरकार पासवान के गरीब कल्याण और बिहार के विकास के स्वप्न को पूरा करेगी. इस ट्वीट से यह भी संकेत मिलता है कि बीजेपी लोजपा के प्रति नरम रुख अपना सकती है.

इतने पर भी कुछ लोग सोच सकते हैं कि रामविलास की बात कुछ अलग थी, चिराग उतना प्रभाव नहीं डाल सकते. इसलिए उनकी पार्टी को झटका भी लग सकता है. लेकिन भारतीय राजनीति में देखा गया है कि सहानुभूति लहर मतदाता के मानस पर गहरा असर डालती है. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला था.