दानवे का नादानी भरा बयान

बेबुनियाद बयान देने से किसी भी नेता की साख नहीं रह जाती. यदि अपनी बात के पक्ष में दूर-दूर तक कोई सबूत न हो तो हवा में तीर चलाने की क्या जरूरत! केंद्रीय मंत्री रावसाहेब दानवे (Raosaheb Danve) ने किसान आंदोलन के संदर्भ में सरासर बेतुका बयान दिया. उन्होंने कहा कि पहले सीएए कानून के विरोध में मुस्लिमों को भड़काया गया था, अब किसानों को उकसाया जा रहा है. किसानों के आंदोलन (Farmers protest) के पीछे पाकिस्तान(Pakistan) और चीन का हाथ है. ऐसा नादानी भरा बयान देकर दानवे ने किसानों की नाराजगी मोल ली है.

क्या दानवे ऐसी अटपटी बात कहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra modi) और गृहमंत्री अमित शाह (Amit shah) को खुश करना चाहते हैं? ऐसी चाटुकारिता निंदनीय है. केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ भीषण ठंड में किसान आंदोलन कर रहे हैं लेकिन उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए तरह-तरह की बेतुकी बातें की जा रही हैं. इसके पहले भी केंद्रीय मंत्री व बीजेपी नेता इस आंदोलन को खालिस्तान समर्थक या बिचौलियों का आंदोलन करार देते रहे हैं. क्या पंजाब के पगड़ी पहनने वाले हर सिख किसान को खालिस्तानी कहा जा सकता है? लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले व्यक्ति को देशद्रोही, गद्दार, अर्बन नक्सली, खालिस्तानी, पाकिस्तान और चीन का मोहरा करार देना क्या अन्याय नहीं है? यह तो असहिष्णुता की पराकाष्ठा हो गई.

लोकतंत्र में विचार भिन्नता का स्थान है लेकिन सरकार व सत्तारूढ़ पार्टी से भिन्न विचार रखने वाले को दुश्मन मान लेना कहां तक उचित है? यदि सरकार व बीजेपी नेता चाहते हैं कि उनकी नीतियों व कदमों का सभी लोग आंख मूंद कर समर्थन करें और जरा भी असहमति न दर्शाएं तो यह लोकतंत्र की कब्र खोदना हो गया. ऐसी प्रवृत्ति लोकतांत्रिक न होकर तानाशाही ही कहलाएगी. दानवे ने जिस तरह का बेसिर पैर का बयान दिया, उसका करारा जवाब देते हुए शिवसेना नेता संजय राऊत ने कहा कि अगर केंद्र के एक मंत्री यह जानकारी दे रहे हैं कि यह जो किसान आंदोलन चल रहा है, इसके पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ है तो रक्षा मंत्री को तुरंत चीन और पाक पर सर्जिकल स्ट्राइक कर देनी चाहिए और राष्ट्रपति, पीएम, गृह मंत्री व सेनाओं के चीफ को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.