खाद्य तेल बेहद महंगा जमाखोरी रोकना जरूरी

    देश में हर किस्म के खाद्य तेल के दाम विगत कुछ महीनों में बेतहाशा बढ़े हैं. न केवल डेढ़ गुना, बल्कि दो गुना तेजी आई है. देश में तिलहन का कम उत्पादन होने से प्रतिवर्ष विदेश से 150 लाख टन से अधिक खाद्य तेल का आयात किया जाता है. 2019-20 में भारत का खाद्य तेलों का आयात बिल 69,000 करोड़ रुपए रहा. देश में सरसों के तेल की भारी मांग है. उत्तरी भारत और बंगाल में इसका इस्तेमाल ज्यादा है. दक्षिण भारत में नारियल तेल खाना बनाने के काम में लिया जाता है. महाराष्ट्र में सोयाबीन, राइस ब्रान, सनफ्लावर ऑइल ज्यादा प्रचलित है.

    1950-51 में पूरे देश में सरसों की खेती 20 लाख हेक्टेयर भूमि पर होती थी. 70 वर्ष बाद यह रकबा बढ़कर 62 लाख हेक्टेयर हो गया है. प्रति हेक्टेयर पैदावार भी 368 किलो से बढ़कर 1500 किलोग्राम हो गई लेकिन देश की आबादी और उपभोग भी बढ़ा है. इन बातों के बावजूद लगभग 7-8 महीने में तेल का दाम लगभग दो गुना हो जाना आश्चर्यजनक है. तिलहन का उत्पादन किसानों को इसलिए लाभप्रद नहीं लगता क्योंकि देश में बड़े आयातक बड़ी मात्रा में विदेश से सस्ता तेल मंगाकर उसकी जमाखोरी कर लेते हैं. सरकार को ऐसे विदेश से मंगाए गए खाद्य तेल के प्रकार, उसकी कीमत और आने वाले समय की जानकारी रखनी चाहिए, तभी वह अंधाधुंध मुनाफाखोरी रोक कर तेल कीमतों पर अंकुश लगा पाएगी.

    तेल के बढ़ते दाम से भी महंगाई बढ़ी है. आयातकों को बैंक 90 से 150 दिनों का उधार देते हैं. तेल तो विदेश से 10-20 दिनों में भारत पहुंच जाता है लेकिन शेष दिनों में उस उधार के दम पर आयातक सट्टेबाजी करने लगते हैं जिससे उपभोक्ता के लिए तेल महंगा होता चला जाता है. आयातकों को दी जाने वाली उधारी की समयसीमा कम की जानी चाहिए.