लखीमपुर को जलियांवाला बाग कहने वाले पवार, गोवारी समाज के मृतकों को भूल गए

    कुछ नेता दूसरों पर दोषारोपण करते समय अपना दामन नहीं देखते. उन्हें अपना अतीत याद नहीं आता कि जब वे सत्तासीन थे, तब कितना जुल्मो-सितम हुआ था! यदि उनकी स्लेट क्लीन हो तो बेशक दूसरे को कटघरे में खड़ा करें लेकिन अपनी न्यूनताओं को छुपाकर दूसरों पर उंगली उठाना कहां तक उचित है? एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने यूपी के लखीमपुर की हिंसा की जलियांवाला बाग से तुलना की है.

    उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग में जैसी स्थिति थी, वैसी ही आज यूपी में हो गई है. इसे किसान भूलेगा नहीं. केंद्र सरकार को असंतोष का सामना करना पड़ेगा. बीजेपी सरकार के काफिले ने किसानों की हत्या की. इस हत्या के लिए यूपी सरकार और केंद्र सरकार जिम्मेदार हैं. सत्ता के दुरुपयोग की इस घटना की जांच सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की कमेटी से करवानी चाहिए.

    कोई पवार से पूछे कि यदि लखीमपुर हिंसा जलियांवाला बाग की पुनरावृत्ति है तो नागपुर में 23 नवंबर 1994 को गोवारी समाज के लोगों की पुलिस लाठियों की मार, गोलीबारी और भगदड़ में हुई मौत क्या थी? तब 114 लोग शहीद हो गए थे. उस समय शरद पवार महाराष्ट्र के सीएम थे. विधानभवन के पास गोवारी समाज के शांतिपूर्ण मोर्चे को घेरकर निर्मम लाठी प्रहार व गोलीबारी की गई, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों की मौत हुई. तब भी पत्रकारों को वहां जाने से रोका गया था. वहां बनाया गया स्मारक उस दिल दहलाने वाली क्रूरता की याद दिलाता है. उस मोर्चे में गोवारी समाज के स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े सभी शामिल थे. अचानक हुए लाठीचार्ज में उन्हें भागने या बच निकलने का मौका नहीं मिल पाया. अवश्य ही लखीमपुर में किसानों को गाड़ी से रौंदे जाने की घटना अत्यंत निंदनीय है लेकिन नागपुर के गोवारी कांड की त्रासदी को भी भुलाया नहीं जा सकता. बीजेपी नेता तो लखीमपुर के जवाब में कांग्रेस को इंदिरा हत्या के बाद 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों की याद दिला रहे हैं.

    सिर पर सवार हो जाता है सत्ता का मद

    देखा गया है कि सत्ताधारी चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ते. उनके दिमाग पर सत्ता और अधिकारों का मद सवार हो जाता है. इसी अकड़ और घमंड में इस तरह के अत्याचार बेहिचक किए जाते हैं. किसान, मजदूर, गरीब व आम जनता के लिए इस तरह के अकड़बाज नेता व उनके परिजनों के मन में किसी प्रकार की हमदर्दी नहीं रहती. वे विरोध प्रदर्शन करने वालों को सिर्फ सबक सिखाना ही नहीं, बल्कि दंडित करना भी चाहते हैं. लखीमपुर में किसानों की गाड़ी से कुचलकर हत्या करने की घटना इसी क्रूर मानसिकता की मिसाल है.

    जलियांवाला बाग का नरसंहार उन क्रूर विदेशी शासकों ने किया था जो भारतीयों को अपना गुलाम मानते थे. आज भी शक्तिशाली नेता सत्ता के घमंड में उन्मत्त होकर वैसा ही आचरण कर रहे हैं. यह उनकी अत्याचारी सामंती प्रवृत्ति लोकतंत्र को कुचल रही है. उन्हें असहमति या विरोध का स्वर पसंद नहीं है. ऐसा रवैया अत्यंत निंदनीय है. लखीमपुर कांड की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसे अपनी करनी की कड़ी सजा मिलनी चाहिए.