Sushant Drugs Case: NCB questions film maker Sohail Kohli

बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा तो कतरा-ए-खूं भी न निकला! यही हालत अभिनेता सुशांतसिंह राजपूत (Sushant singh rajput) मामले की हुई जिसमें सीबीआई (CBI) को किसी तरह की साजिश नजर नहीं आई और वह इस प्रकरण पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर इसका पटाक्षेप कर सकती है. यह ऐसा मामला था जिसमें मुंबई पुलिस की कुशलता व नीयत पर शक जाहिर करते हुए सीबीआई जांच की मांग की गई थी. लेकिन क्या हुआ! पहाड़ खोदने पर चुहिया तक नहीं मिली.

इस प्रकरण में कुछ टीवी चैनलों ने अपनी टीआरपी बढ़ाने के इरादे से अति उत्साह दिखाया और खुद को दूसरे चैनल से आगे व नंबर वन दिखाने की होड़ में खूब चीखते-चिल्लाते रहे. वे अपना मीडिया ट्रायल चलाते रहे. ऐसा दिखाने की कोशिश की गई मानो समूचा बालीवुड ड्रग के नशे की गिरफ्त में है. टीआरपी घोटाला तो सामने आ ही गया कि कैसे लोगों को पैसे देकर एक ही चैनल लगातार देखने को कहा गया. यह रवैया मर्यादाविहीन और आराजकतापूर्ण था. लोगों ने महसूस किया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नियंत्रित करने के लिए भी कोई अथॉरिटी होनी चाहिए. इस प्रकरण को ऐसा रूप देने की कोशिश की गई कि सुशांत की मौत की वजह आत्महत्या नहीं, हत्या है.

और चूंकि वह स्टार किड (किसी फिल्मी सितारे का बेटा) नहीं था, इसलिए उसे साजिश के तहत खत्म करवा दिया गया. उसकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती को विषकन्या के रूप में प्रोजेक्ट किया जाता रहा. कुछ लोगों की नशाखोरी को विराट रूप देकर पूरी फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम करने की कोशिश की गई. सुशांत के साथियों द्वारा उसे ड्रग का सेवन कराने, जहर देने, गला घोंटकर मारने और फिर फांसी पर लटकाने, उसके बैंक खाते से करोड़ों रुपए गायब करने, फार्महाउस में अभिनेत्रियों के साथ अय्याशी करने की भरपूर ‘कहानियां’ गढ़ी गईं.

टीवी चैनल व्यर्थ की जासूसी और सनसनी पर उतर आए और यह भी बताने लगे कि किस जांच एजेंसी ने किससे कितने घंटे में क्या-क्या सवाल किए. इस प्रकरण ने सुशांत को न्याय दिलाने के नाम पर उसकी छवि बिगाड़ी, साथ ही बॉलीवुड को भी लपेटे में ले लिया. दादा साहेब फालके ने जिस भारतीय फिल्मोद्योग की नींव रखी, उसे बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई. इस दौरान कोरोना संकट, अर्थव्यवस्था की चुनौतियां, चीन का खतरा जैसी सारी बातों को दरकिनार कर सिर्फ सुशांत का प्रकरण ही चलाया गया. क्या यह ऐसे चैनलों की स्वार्थपूर्ण मक्कारी व धूर्तता नहीं थी? मामला जांच और सबूतों की बुनियाद पर टिकता है, न कि टीवी चैनलों की लफ्फाजी पर! क्या इस मामले के पटाक्षेप के बाद ऐसे खबरिया चैनल अपनी जिम्मेदारी व मर्यादा समझेंगे?