Heavy damage to crops due to rain and hail

    • सोयाबीन व तुअर के बंपर उत्पादन का नया फार्मूला

    चांदूर रेलवे. कृषि विभाग के नये फार्मूले ने सोयाबीन व तुअर उत्पादक किसानों की उम्मीदों को नये पंख लग गए है. तहसील के बोरी गांव में यह फार्मूला उपयोग में लाया गया है. जिससे प्रति एकड़ 10 क्विंटल सोयाबीन व 6 क्विंटल तुअर के उत्पादन की आशा पल्लवित होने से संबंधित किसानों में नया उत्साह देखा जा रहा है. प्रति वर्ष सोयाबीन, तुअर की बड़े पैमाने पर बुआई की जाती है. नये-नये सीड्स उपयोग में लाए जाते है. उसका अच्छी तरह से व्यवस्थापन बी करते है. लेकिन दोनों फसलों का उत्पादन नहीं बढ़ पाता.

    कृषि विभाग ने इसका कारण खोज निकाला है. सोयाबीन व तुअर फसल की बुआई पद्धति बदली और किसानों को दोनों फसलों का बंपर उत्पादन मिल सकता है. इसके लिए चांदूर रेलवे के कृषि विभाग ने किसानों को सोयाबीन, तुअर पट्टाक्षेत्र पद्धति से बुआई का आह्वान किया था. चांदूर रेलवे तहसील के गांव-कस्बों में पट्टाक्षेत्र पद्धति से किसानों ने बुआई निपटाई है. जिसका लाभ देखने मिल रहा है. सोयाबीन पौधों को फल्लियां ही फल्लियां लगी नजर आ रही है. 

    3 से 4 कतार के बाद खाली रखे जगह 

    चांदूर रेलवे तहसील के बोरी स्थित कृषि सहायक एडी चौकड़े ने वहां के किसानों को पट्टाक्षेत्र बुआई करने का आह्वान किया. जिस पर अधिकांश किसानों ने अमल किया. बोरी गांव में गौरव शिरभाते, अतुल गुल्हाणे, रवि देशमुख, मंगेश शिरभाते, शरदराव गुल्हाणे समेत अनेक किसानों ने लगभग 105 हेक्टेयर यानी 260 एकड़ में सोयाबीन व तुअर की पट्टाक्षेत्र पद्धति से बुआई की.

    तहसील में सर्वाधिक बुआई करने वाला गांव साबित हुआ है. इस बुआई पद्धति में तीन से चार कतार के बाद एक कतार खाली रखी जाती है. सोयाबीन व तुअर की एक साथ बुआई करने पर आस-पडोस की कतार खाली रखी जाती है. यही बात किसानों को नागवार गुजरती है. 

    10 से 12 किलो बीजों की बचत 

    जिससे उत्पादन कम होने की चिंता होती है. लेकिन एक कतार खाली रखने पर उत्पादन बढ़ता है. क्योंकि एक कतार की गैप से सोयाबीन, तुअर को हवा अत्याधिक मिलती है. योग्य सूर्यप्रकाश मिलता है. छिड़काव भी अच्छी तरह से किया जा सकता है. पुरानी बुआई पद्धति से सोयाबीन के प्रति एकड़ 30 से 35 किलो बीज लगते है. लेकिन पट्टाक्षेत्र पद्धति से प्रति एकड़ 20 से 25 किलो बीज आवश्यक है. जिससे बीजों की भी 10 से 12 किलो बचत होती है. जिससे किसानों के प्रति एकड़ 1000 से 1200 रुपए बचते है.

    सोयाबीन व तुअर आपस में नहीं टकराते. जिससे रोग व किड़ों का प्रभाव नहीं होता. इतने लाभ पट्टाक्षेत्र बुआई से है. बोरी में इसी पद्धति पर अमल किये जाने के बाद निरीक्षण दौरे में तहसील कृषि अधिकारी राजेंद्र बांबल, मंडल कृषि अधिकारी गोपाल किल्लेकर, कृषि पर्यवेक्षक विनोद बोबडे, कृषि सहायक एडी चौकड़े, किसान  रामा वाघाये, सागर हांडे, पुलिस पाटिल विजय मेश्राम, सरपंच माया मेश्राम, विजय शेंडे, सचिन बलाखे, अमोल मेश्राम उपस्थित थे.

    बंपर उत्पादन 

    पुरानी बुआई में सोयाबीन के 6 घंटों के बाद एक घंटा तुअर का होता है. लेकिन इस नई पद्धति से 4 घंटों के बाद 1 घंटा तुअर का होता है. तुअर की आस-पास के घंटे खाली होते है. जिससे सोयाबीन का उत्पादन बढ़ता है. तुअर को भी लाभ होता है. जनरल बुआई की तुलना में ज्यादा टहनियां लगती है. -एडी चौकड़े, कृषि सहायक बोरी