Imgae: 
N.Biren Singh/Twitter
Imgae: N.Biren Singh/Twitter

    टोक्यो: टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympic 2020) में भारत की उम्मीद अभी भी ज़िंदा है। भारत में अभी भी कई मेडल आ सकते हैं। भारतीय महिला हॉकी टीम (Indian Women Hockey Team Won Match Against South Africa) ने ग्रुप-A के अपने आखिरी मैच में साउथ अफ्रीका को 4-3 से हरा दिया है। जो भारत के लिए बहुत गर्व की बात है। इस मैच में उत्तराखंड के हरिद्वार के छोटे से गांव रोशनाबाद की रहने वाली वंदना कटारिया (Vandana Kataria) ने कमाल कर दिखाया है। उन्होंने अपने इस मैच में 3 गोल दागकर इतिहास रच दिया। वे ओलंपिक मैच में गोल की हैट्रिक लगाने वाली पहली भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी बन गई हैं। उनके गोल की बदौलत ही भारत के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने की उम्मीद अभी भी बरकरार है। 

    हॉकी में हैट्रिक बनाने वाली पहली भारतीय महिला 

    वंदना ने इस मैच में 4 में से 3 गोल अकेले दागे हैं। इसी के साथ वो पहली ऐसी भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ी भी बन गईं, जिन्होंने ओलंपिक के एक मैच में 3 गोल दागे हैं। बता दें कि 1984 के बाद किसी भारतीय ने ओलंपिक में हैट्रिक नहीं लगाई थी। इसके साथ ही राजनीतिज्ञ तथा मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह (Manipur Chief Minister N Biren Singh) ने भी महिला हॉकी टीम की तारीफ करते हुए सोशल मीडिया साइट ट्वीटर पर एक पोस्ट शेयर किया है।

    खो-खो प्लेयर थीं वंदना 

    वंदना हॉकी से पहले खो-खो प्लेयर थीं। 2002 में खो-खो की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वंदना ने शानदार रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है। इसके बाद कोच कृष्ण कुमार ने 11 साल की वंदना की ऊर्जा देखकर उन्हें हॉकी में उतारा था। वंदना बताती हैं कि उनकी रनिंग स्पीड बेहद अच्छी थी और ये ही वजह थी कि यह हॉकी में आईं। 2003 में हॉकी के कोच प्रदीप चिन्योटी वंदना को अपने साथ मेरठ ले गए थे। जहां 2005 में उनके पास हॉकी की ट्रेनिंग के लिए पैसे नहीं थे। इसे बाद वंदना के पिता नाहर सिंह कटारिया ने किसी तरह उधार लेकर पैसों का इंतजाम किया और वंदना के सपनों को पूरा करने में उनकी मदद की। जिसके बाद 2006 में वंदना को केडी सिंह बाबू स्टेडियम लखनऊ में एडमिशन लिया और वहीं ट्रेनिंग शुरू की। 

    पिता के निधन पर नहीं जा सकीं अपने गांव

    टोक्यो ओलंपिक से 3 महीने पहले अप्रैल में वंदना के पिता नाहर सिंह का निधन हो गया था। ऐसे में वंदना ने ऐतिहासिक उपलब्धि से दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि दी है। अपनी तैयारी के चलते वह पिता के निधन पर अपने गांव भी नहीं जा सकी थीं। वंदना की इस उपलब्धि पर परिजनों, ग्रामीणों और जिले के खेल अधिकारियों में बहुत जश्न भी मनाया है। अपने पिता के निधन के बाद वंदना ने उनकी याद को ही अपनी प्रेरणा बना लिया और उनके लिए ही वह ओलंपिक मेडल जीतने को अपना लक्ष्य बना लिया है।