पूर्णत: जलकुंभी से भरा मोर्णा नदी का पाट, मच्छरों ने किया नागरिकों का जीना दुश्वार

    अकोला. शहर के बीचोबीच से बहने वाली मोर्णा नदी के पाट में पिछले कई सालों से जलकुंभी तेजी से बढ़ रही है. इससे पानी का प्रवाह रुक गया है. मनपा की सभाओं में कई बार इस विषय में सत्तारूढ़ पार्टी एवं विपक्ष के बीच गर्मागर्मी हो चुकी है, मगर स्थिति जस की तस ही है.

    मोर्णा के पाट में शहर का निकासजल छोड़ा जाता है. कुछ कारखानों द्वारा भी नदीपाट में ही दूषित जल छोड़े जाने से पानी पूर्णत: प्रदूषित हो गया है. जलकुंभी निकालने का प्रयास इससे पहले भी किया जा चुका है. इस समस्या को स्थायी रूप से हल करने हेतु कई राजनैतिक दल आंदोलन भी कर चुके हैं, मगर कार्रवाई सिर्फ नाममात्र की ही हुई. हर साल यह मुद्दा उठाया जाता है और समस्या के निराकरण हेतु लाखों रुपए की व्यवस्था की जाती है. नदीपाट का कुछ भाग कुछ दिनों तक स्वच्छ रहता है, मगर उसके बाद जलकुंभी पुन: पनप जाती है.

    शाम होते ही शुरू हो जाता है मच्छरों से संघर्ष

    फिलहाल नदी में जलकुंभी पूरे शबाब पर है. इसके चलते नदी तट पर स्थित गुलजारपुरा, हरिहर पेठ एवं अनिकट आदि स्थानों पर रहने वाले नागरिकों को शाम होते ही मच्छरों से संघर्ष करना पड़ता है. नागरिक अपने घरों में धुआं भरकर मच्छरों से बचने का प्रयास करने लगते हैं.

    बारिश के मुहाने पर भी नहीं बदली स्थिति

    जून में बारिश शुरू हो जाती है. मार्च, अप्रैल व मई में नदीपाट लगभग सूखा रहता है. इस दौरान सफाई आसानी से की जा सकती है, मगर वैसा कभी नहीं किया जाता. अब जून के लिए कुछ ही दिन शेष बचे हैं. बारिश के साथ जलकुंभी भी बढ़ जाएगी. यह समस्या पिछले तीन महीनों में ही सुलझाना जरूरी था.