KBC(मराठी) में पहुंचे जिले के पहले व्यक्ति जयकृष्ण आकरे से नवभारत की खास बातचीत

    • प्रतियोगी परीक्षा में सफलता की महत्वपूर्ण कड़ी है केबीसी,
    • ज्ञान तथा भविष्य दोनों के लिए अच्छा है केबीसी जैसा मंच

    भंडारा. टेलिवजन पर प्रसारित होने वाले केबीसी हिंदी और मराठी दोनों ही प्रतियोगी परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों के लिए बहुत बड़ा मंच है. इस प्रोग्राम के माध्यम के जो लोग हाट सीट तक पहुंचे और वहां पहुंचकर अच्छी खासी रकम जीती है, उनके मेहनत तथा ज्ञान दोनों की प्रशंसा की जानी चाहिए, ऐसा बयान कौन बनेगा करोड़पति (मराठी) में भंडारा जिले के पहले व्यक्ति के रूप हाट सीट पर पहुंचे जयकृष्ण आकरे ने दिया है.नवभारत के साथ विशेष बातचीत के दौरान जयकृष्ण आकरे ने बताया कि उन्होंने जो धनराशि जीती है, उसके लिए लगातार सामान्य ज्ञान के बारे में जानकारी हासिल करता रहा. 

    आकरे का कहना है कि कौन बनेगा करोड़पति (मराठी) में 6.4 लाख रूपए जीतकर भंडारा जैसे छोटे जिले का नाम रौशन करने का पहला मौका मिलना मेरे जीवन की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है. इस उपलब्धि को सदैव अपनी स्मृति में रखने की बात कहने वाले जयकृष्ण आकरे का कहना है कि मैं एक किसान परिवार से हूं.

    मेरे जैसे साधारण व्यक्ति का हाट सीट तक पहुंचना यही बताता है कि इस प्रोग्रोम में हाट सीट तक पहुंचने की प्रक्रिया बड़ी पारदर्शी है, इसमें हाटसीट तक पहुंचने तथा उसके बाद बड़ी रकम जीतने तक का सफर बहुत मुश्किल है. पहले कई दौर की परीक्षा, उसके बाद हाट सीट पर सचिन खेड़ेकर जैसे अभिनेता का सामना, उसके बाद प्रश्नों के उत्तर, यह सब कुछ बहुत मुश्किल है.

    आकरे ने एक सवाल के जबाव में बताया कि मुझे 24 मार्च, 2021 को नामांकन के बाद लंबे समय तक जब केबीसी से फोन नहीं आया तो मैंने यह मन बना लिया कि मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ है, अब मुझे नहीं बुलाया जाएगा, तभी अचानक एक दिन  फोन आया और पूछा गया कि आप किस तारीख को आ सकते हैं, उसके बाद भरोसा हो गया हाटसीट बहुत दूर नहीं है.

     आकरे का कहना है कि जिस सादगी तथा सहयोग का दर्शन मुझे सचिन खेडेकर समेत सेट पर उपस्थित लोगों में देखने को मिला उसमे मैं बहुत अभिभूत हुआ. किसी प्रश्न पर अटक जाने की स्थिति में सचिन खेड़ेकर की ओर जो ढांढ़स बंधाया गया, वह निश्चय ही काबिलेतारीफ है. आकरे का मानना है कि केबीसी मराठी हो या हिंदी दोनों के सभी एपिसोड़ देखने चाहिए. हर एपिसोड में पूछे गए प्रश्नों तथा उनके उत्तर को लिख कर रखना चाहिए.

    ये सभी प्रश्न किसी प्रतियोगी परीक्षा में पूछे भी जा सकते हैं. आकरे ने प्रतियोगी परीक्षा में भाग ले चुके हर व्यक्ति से अपील की कि वे कौन बनेगा करोडपति को हिंदी मराठी दोनों को सिर्फ ईनाम जीतने तक ही सीमित होकर न देखें, बल्कि इन प्रश्नों को प्रतियोगी परीक्षा में सफलता पाने के रूप में देखें. 

    आकरे ने बताया कि उन्हें केबीसी मराठी में 6.4 लाख रुपए की धनराशि जीतने में इसलिए सफलता मिली, क्योंकि उन्होंने पहले एमपीएस की परीक्षा दी थी. प्रतियोगी परीक्षा में की गई तैयारी का सिलसिला लगातार जारी रहना चाहिए, क्योंकि कौन सा प्रश्न किस परीक्षा में पूछ लिया जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. 

     एक प्रश्न के उत्तर में आकरे ने बताया कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में आगे रहना है तो हर दिन होने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी रहनी जरूरी है. केबीसी को पुरस्कार पाने की दृष्टि से नहीं बल्कि ज्ञार्नाजन की दृष्टि से देखना जाए यह बहुत ही अच्छी पहल होगी, ऐसी सोच रखने वाले जयकृष्ण आकरे का कहना कि जब हाट सीट पर अपने गांव, अपने कस्बे, अपने मोहल्ले, अपने पड़ोस का कोई व्यक्ति बैठा दिखायी देता है तो बहुत आनंद होता है.

    12.5 लाख रूपए के लिए पूछे गए प्रश्न का उत्तर न देने पाने पर अफसोस जताते हुए आकरे ने कहा कि अगर मैंने सामान्य ज्ञान के प्रश्नों के बारे में जानने के क्रम को विराम नहीं दिया होता तो शायद मैं और ज्यादा धनराशि जीतने में कामयाब हो जाता, लेकिन 6.4 लाख रुपए जीतने के बाद भी जिस तरह से मेरे पास-पडोस में रहने वालों ने, मेरे कार्यालय के लोगों ने मेरा अभिवादन किया, उससे मुझे इस बात का एहसास हो गया कि किसी बड़े प्रोग्राम में पहुंचने और वहां से अच्छी सफलता पाने के क्या मायने होते हैं. 

    भंडारा के न्यू शिवाजीनगर में रहने वाले जयकृष्ण आकरे को इस बात का गर्व है कि उन्हें भंडारा जिले से केबीसी मराठी में हाट सीट पर बैठने का सबसे पहला मौका मिला, लेकिन जयकृष्ण आकरे की तमन्ना है कि वे केबीसी (हिंदी) के लिए भी चुने जाए तथा अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार के सामने बैठकर कौन बनेगा करोड़पति में भी हाट सीट पर बैठने का गौरव हासिल करें.

    आकरे ने जिले के युवकों, प्रतियोगी परीक्षा में शमिल होने वाले सभी प्रतियोगियों से कहा है कि मंजिल मुश्किल जरूर है, पर असंभव नहीं, कोशिश करो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं. आकरे की लगन ने उन्हें 6.4 लाख रूपए तक पहुंचाया. जयकृष्ण आकरे का कहना है कि कोशिश करने वाले की हार नहीं होती, इसलिए लगातार कोशिश करने वाले को एक न एक दिन मुकाम मिल ही जाता है.