– एजाज अली

    • आज जलदिन पर विशेष

    चंद्रपुर: ग्रीष्मकाल लगते ही नदी नाले सूखने शुरू हो जाते है, भूगर्भ जलस्तर काफी नीचे चला जाता है., हैन्डपंप, बोरिंग आदि पानी के बजाय हवाएं फेंकने लगते है. आधुनिक जीवनशैली का नतीजा यह है कि महानगर में रहनेवाले नागरिक हर साल ग्रीष्मकाल में पेयजल संकट का सामना करते है. पानी के लिए त्राहि त्राहि मची नजर आती है, पेयजल के लिए भटकते लोगों की खबरें समाचारपत्रों की सुर्खियों में होती है यह नजारा केवल ग्रीष्मकाल के दौरान काफी विकराल रूप लेता हुआ नजर आता है.

    परंतु उन लोगों की स्थिति को क्यो कहा जाए जिन्हें इस नरकीय यातनाओं से केवल पूरे 12 महीने जूझना पड़ता हो और ग्रीष्मकाल तो उनके लिए सबसे दुखदायी भरा होता है. यह लोग और कोई नहीं बल्कि जिले के जिवती तहसील के घोडनकप्पी के कोलाम आदिवासी है. जिन्हें आज भी जीवन बचाने के लिए रोजाना संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है. और उनके जीवन में किसी तरह का कोई बदलाव अब तक नहीं हो पाया है. आश्चर्य का विषय है कि यहां पीने को शराब मिल जाती है परंतु पेयजल के लिए जान जोखिम में डालना पड़ता है.

    चंद्रपुर जिले के माणिकगड पहाड की दुर्गम घाटियों में बसा घोडनकप्पी ग्राम मानवी जीवन के लिए आवश्यक सभी सुविधाओं से वंचित है. चंद परिवारों की आदिवासी कोलाम बस्ती है जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित है.एक तरफ देश मंगल पर जीवन खोजने के लिए लगातार प्रयासों में जुटा है और वहीं इसी जिले के आदिवासी परिवारों के लिए कुछ भी मंगल नहीं है. घोडनकम्पी वासियों के लिए बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं दिवास्वप्न ही है.

    जिवती तहसील का माणिकगड पहाड़ पर बसा घोडनकम्पी गांव तहसील मुख्यालय से लगभग 10 किमी दूरी पर है. गांव के अतिक्रमित पथरीली जमीन पर कड़ी मेहनत कर वे खेती करते है और इससे उनकी उपजीविका चलती है. गांव तक पहुंचने के लिए कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है. गांव तक जानेवाली पगडंडी घाटी के अत्यंत दुर्गम क्षेत्र के तीन गहरे बरसाती नालों को पार करते हुए गुजरती है. यह पगडंडी अत्यंत पथरीली, उतार चढाव भरी और झाडियों से ओतप्रोत है. गांव में पैदल या बैलगाडी से पहुंचा जा सकता है.

    घोडनकम्पी गांव  में रहनेवाले लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या पानी की है. चूंकि गांव पूरी तरह से पथरीली जमीन पर बसा हुआ है. इसलिएयहां चारों और कही पानी उपलब्ध नहीं है गांव के आसपास के परिसर में कुआं खोदना असंभव है. इसके लिए की गई सभी कोशिशे नाकाम साबित हुई है. सम्पूर्ण गांव पानी की आवश्यकता की पूर्ति एक अत्यंत छोटे से झरने से करता है. इस झराने से जानवर भी और इंसान भी अपनी प्यास बूझाते है. जो कि गहरी खाई में लगभग आधा किमी दूर ढलान पर जमीन से रिसता है यहां गड्ढे  में जमा होनेवाला पानी अत्यंत गंदा होने के बावजूद गांव वासी इस पीने के लिए विवश है.

    अन्य काम के लिए पानी दो किमी दूर नीचे खाई से बहनेवाले नाले में उतरकर लाना पड़ता है. खाई में उतरनेवाली ढलान इतनी खतरनाक है कि संतुलन बिगडने पर बचने की संभावना अत्यंत क्षीण होती है. ग्रीष्मकाल में कुएं का जलस्तर काफी नीचे जाने के बाद काफी भीषण स्थिति होतीहै. ऐसे में सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि ग्रीष्मकाल में एक एक बूंद पानी इन आदिवासियों के लिए कितना बहूमूल्य होता होगा.

    जिवती तहसील के हिरापुर, खडकी, मरकागोंदी, शेणगांव, टेकामांडवा, मरकलमेटा, केकेझरी आदि गांव में नलयोजना का काम 2005  से अटका हुआ है. पांच वर्ष पूर्व शंकरपठार में बिजली बिल नहीं भरने से जलापूर्ति का बिजली कनेक्शन काट दिया गया है. गांव वासी को 300 से 500 रुपये खर्च कर पानी खरीदना पड़ता है. मरकागोंदी में लाखों रुपये खर्च कर पानी की टंकी बनाई गई है. मोटरपंप और पाईपलाईन के के अधूरे पड़े रहने से आज भी नागरिक बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे है.