विदेश जा रही चंद्रपुर में बनी बांबू राखियां, मेहनत के अनुपात में कीमत न मिलने का दर्द छलका

    बढ़े राखी के पूरक सामग्री के दाम

    चंद्रपुर. चंद्रपुर जिला बांस के जंगल के लिए विख्यात है. इसी बांस का कलात्मक उपयोग कर बुनी हुई राखियां यूरोप में दस्तक दे रही है. द बांबू लेडी ऑफ महाराष्ट्र के नाम से राजय लोकसेवा आयोग के प्रश्नपत्र में शुमार मिनाक्षी मुकेश वालके द्वारा बनाई राखियां एक्सपोर्ट हो रही है. अमेरिका, कनाडा, दुबई, सिंगापुर, लंदन, न्यूजीलैंड, स्वीजरलैंड, फ्रांस, स्वीडन, नीदरलैंड जैसे देशों में यह राखियां पहुंची है. विश्व विख्यात बांस शिल्पी मिनाक्षी वालके ने बताया कि इस बार उन्होने दस हज़ार से ज्यादा राखियां बनाई. जो विदेशों तक पहुंच जिला ही नहीं भारत देश के लिए गर्व की बात है.

    बांबू से बना रही पर्यावरण पूरक राखी

    यहां के बंगाली कैंप झोपडपट्टी में रहने वाली बांबू लेडी मिनाक्षी वालके और उनकी महिला सहयोगियों द्वारा बनायी राखियों की आज विश्व भर में मांग है. इस माध्यम से झोपडपट्टी की महिलाओं को रोजगार मिला है. लाकडाउन के दौरान आर्थिक संकट में रही महिलओं को इस माध्यम से रोजगार मिला है. बांबू से पर्यावरण पूरक राखी बनाने का काम मिनाक्षी और उनकी टीम कर रही है. बिना किसी विरासत के मिनाक्षी ने अभिसार इनोवोटिव नाम का सामाजिक उपक्रम शुरु किया है.

    इस माध्यम से उन्होंने झोपडियों में रहने वाली महिला और युवतियां को प्रशिक्षण देकर उन्हे आर्थिक रुप से स्वावलंबी मनाया है. मई महीने से राखी बनाने के काम की शुरुआत हुई. प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद महिलाएं अपने घर से ही यह काम करती है आज यहां के राखियों की मांग अनेक देशों में पहुंच रही है. स्वीजरलैंड निवासी सुनीता कौर ने मिनाक्षी के बांबू के राखी के साथ अन्य वस्तू बिक्री के लिए मंगायी. स्वीडन के सचिन जोंनालवार के साथ लंदन की मीनाक्षी खोडके ने भी ग्लोबल बाप्पा शो रुम के लिए राखिया खरीदी है.

    मेहनत को नही मिलती कीमत

    बांबू की राखियां बनाने में बहुत मेहनत लगती है. इस बीच विविध पूरक सामग्री की दरें भी बढी है. ऐसे में लोग सस्ती राखियां चाहते है. जो संभव नही है. परन्तु रोजगार के लिए बांस शिल्पी इन्हे बड़ी आस लिए बनाते है. इस सीजन में प्रत्यक्ष 20- 25 तो परोक्ष 100 से ज्यादा लोगों को काम मिल जाता है. लोग कला की कद्र करने में कतराते है, ऐसा शिल्पियों का दर्द है.

    देश भर में चल पड़ा प्लास्टिक मुक्त पैटर्न

    बांस की राखियों में आधिकांश प्लास्टिक-फाइबर के मणि आदि के साथ सिंथेटिक धागा लगा कर उन्हें सजाया जाता है. मिनाक्षी ने इस पैटर्न को सबसे पहले बदला. पूरी तरह प्लास्टिकमुक्त राखी का ट्रेंड उन्होने सेट किया. आज इसका अनुकरण देश भर में हो रहा है. मिनाक्षी द्वारा किया गया रुद्राक्ष, तुलसी मणि और खादी धागे का आकर्षक मिलाप बांस की राखियों में काफी सराहा गया है.

    देश में लोकप्रिय है मिनाक्षी की राखियां

    मिनाक्षी ने बांस की पारंपरिक राखियों में नित नए प्रयोग किए. लोगों का इन राखियों के प्रति रुझान बढ़ाया. आज देश में सर्वाधिक लोकप्रिय उन्ही की राखियां है. गूगल सर्च करने वाले यह मानते है कि सबसे अधिक तस्वीरे मिनाक्षी की राखियों के मिलते है. 

    मिनाक्षी बनी बांबू राखियों का ब्रांड

    लोग अपनी किसी वस्तु को ब्रांड बनाने में काफी समय और रुपया लगा देते है. जहा तक बांस राखियों का मामला है, देश में मिनाक्षी वालके इसकी ब्रांड बन गई है. उनकी राखी का कोई ब्रांड नेम नही है. सादी सफेद पेपर पर पैकिंग है. बावजूद केवल मिनाक्षी के नाम पर हजारों राखियां हर वर्ष देश के कोने कोने में पहुंचती है. यहां तक की विदेशों में रहने वाली बहने अपने भारतीय भाईयो के लिए मिनाक्षी से राखी मंगवाते है.