Bombay High Court
बोम्बे हाई कोर्ट (फाइल फोटो)

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  • सिर्फ कागजों तक सीमित ना रहे दिव्यांगों का कानून: हाईकोर्ट 
नवभारत न्यूज नेटवर्क
मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) ने रेलवे (Railway) में सहायक पद के लिए एक दिव्यांग महिला (Divyang woman) की उम्मीदवारी को ने रद्द करने के लिए विभाग को फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने महिला को राहत देते हुए रेलवे के इस फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही रेलवे भर्ती इकाई को छह सप्ताह के भीतर महिला की उम्मीदवारी पूरी करने का निर्देश दिया। यह स्पष्ट करते हुए कि विकलांग व्यक्तियों के लिए कानून में ऐसा नहीं होना चाहिए। इसे किताबों या कागजों तक ही सीमित न रखा जाए, बल्कि संवेदनशीलता और सख्ती से लागू किया जाए। 
 
कोर्ट की राय
यह मामला इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक आलस्य ने विकलांगता कानून के उद्देश्य को विफल कर दिया है। न्यायमूर्ति नितिन जामदार और मिलिंद सत्ये की पीठ ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए कहा, दृष्टिबाधित व्यक्ति शारीरिक अक्षमताओं के कारण टाइप करने में त्रुटि कर सकते हैं या विकलांगता के कारण दूसरों पर निर्भर हो सकते हैं।हालांकि, विकलांगता से उत्पन्न इन दोषों के आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है, उनके साथ गलत व्यवहार नहीं किया जा सकता है। इसलिए कोर्ट ने रेलवे के फैसले को रद्द करते हुए इस बात पर भी जोर दिया कि उम्मीदवारों के आवेदन को खारिज करना और फिर गलतियों को सुधारने से इनकार करना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। 
 
 
जन्म तारीख में थी त्रुटि 
याचिकाकर्ता शांता सोनवणे ने रेलवे में सहायक पद पर उम्मीदवारी रद्द किये जाने को चुनौती दी थी। सोनावणे की उम्मीदवारी उनके जन्म वर्ष के संबंध में एक त्रुटि के कारण खारिज कर दी गई थी। अगस्त 2023 में सोनवणे की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रेलवे प्रशासन को याचिका पर अंतिम फैसला आने तक सहायक का एक पद खाली रखने और याचिकाकर्ता की मांग पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। हालांकि, रेलवे ने कहा कि सोनवणे के आवेदन में त्रुटियां होने के कारण उनका आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सका।