अव्यवस्था: मरीजों को निजी अस्पताल में मनमाने दामों पर करानी पड़ रही है जांच

    • केंद्रीय मंत्री भी नहीं दिला पाए MRI मशीन 
    • विदर्भ के साथ दूसरे प्रदेशों से इलाज के लिए शहर में आते हैं सैकड़ों मरीज   

    नागपुर. कहने को तो नागपुर को महाराष्ट्र की मिनी राजधानी कहा जाता है लेकिन यहां सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराई हुई हैं. इन्हें दुरुस्त करने में यहां के केंद्रीय मंत्री सहित तमाम जनप्रतिनिधि फेल साबित हो रहे हैं. मेडिकल में करीब ढाई साल से   एमआरआई बंद  पड़ी है. मेयो में कुछुआ गति से काम चल रहा है. ऐसे में मरीजों को अपनी जान बचाने के लिए निजी अस्पताल में एमआरआई जांच करानी पड़ रही है. बीते 2 सालों में मरीजों के साथ डॉक्टरों ने भी नई मशीन के लिए तमाम कोशिशें कर लीं, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से भी आश्वासन ले लिया. 15 करोड़ रुपए भी दिलवा दिए लेकिन मशीन का कोई अतापता नहीं है. 

    ये हो रहे नुकसान 

    • सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर इलाज के साथ प्रेक्टिस भी करते हैं लेकिन यहां तो एमआरआई जैसी महत्वपूर्ण मशीन ही नहीं है. ऐसे में मेडिकल छात्र किस पर प्रेक्टिस करेंगे. कई छात्रों ने एमआरआई की हाईटेक मशीन देखी भी नहीं है. 
    • अस्पताल में अगर कोई मशीन बिगड़ जाए तो उसे ठीक करने के लिए डॉक्टरों को आंदोलन करना पड़ता है. ऐसे में भावी डॉक्टरों के मन में शहर के प्रति निगेटिव सोच बनती है. वे यहां से पलायन कर सकते हैं जिसका नुकसान मरीजों को होगा.
    • प्रत्येक चुनाव में जनप्रतिनिधि स्वास्थ्य सुविधाओं को ठीक करने का दावा करते हैं लेकिन चुनाव के बाद भूल जाते हैं. ऐसे में आमजन के मन में जन नेताओं की छवि भी खराब होती है जिसका खामियाजा उनको चुनाव में और मरीजों को जेब कटाकर भोगना पड़ता है. 

    कोर्ट से भी फटकार

    हाई कोर्ट के बार-बार निर्देश के बाद भी सरकारी अस्पतालों में एमआरआई मशीन नहीं लग पा रही है. इस मामले में अस्पताल प्रबंधन और राज्य सरकार के वकील एक दूसरे के पाले में गेंद फेंकते नजर आते हैं. कोई प्रक्रिया को जटिल बताता है तो कोई राज्य सरकार द्वारा मंजूरी के बाद भी बजट उपलब्ध न कराने बात कह रहा है. यह क्रम बीते ढाई सालों से चल रहा है. एक मशीन के लिए शुरू हुआ दंगल कब तक चलेगा, किसी को कुछ नहीं पता.

    मरीजों की जान आफत में 

    मेडिकल और मेयो में एमआरआई मशीन न होने के साथ दूसरी बड़ी समस्या यह है कि यहां जो भी मशीनें हैं वे कभी भी खराब हो जाती हैं. इससे अस्पतालों में लंबी वेटिंग लगती है. ऐसे में गंभीर मरीजों को जांच के लिए निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है. इसी प्रक्रिया में कई मरीज कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं. इनकी मदद करने के लिए न सरकार में बैठे लोग आते हैं, न ही सरकार की नाकामियों को उजागर करने वाले विपक्षी पार्टियों के लोगों को इनकी चिंता सताती है.