Ravi Rana and HC

    नागपुर. विधानसभा के वर्ष 2019 में हुए आम चुनावों में विधायक रवि राणा द्वारा निर्धारित खर्च से अधिक का खर्च किए जाने की हर स्तर पर जांच होने के बाद चुनाव आयोग के पास जनप्रतिनिधि कानून की धारा 10 ए के अनुसार कार्रवाई करने का आवेदन किया गया. किंतु लंबा समय बीत जाने के बावजूद अब तक चुनाव आयोग की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई. जिसे लेकर सुनील खरात की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई. याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से जवाब दायर करने भारत निर्वाचन आयोग को अंतिम मौका प्रदान किया गया था. निवार्चन आयोग की ओर से हलफनामा दायर कर विधायक राणा को 8 अक्टूबर को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी उजागर की गई. जिसके बाद न्यायाधीश सुनील शुक्रे और न्यायाधीश अनिल किल्लोर ने 6 माह के भीतर जांच पूरी करने के आदेश जारी किए.

    याचिका का उद्देश्य काफी हद तक हल

    सुनवाई के बाद अदालत ने आदेश में कहा कि भारत निर्वाचन आयोग की ओर से दायर हलफनामा में भी 6 माह में जांच पूरी करने का आश्वासन दिया है. जिससे याचिका दायर करने का उद्देश्य काफी हद तक हल हो गया है. अत: याचिका का निपटारा करने के आदेश भी अदालत ने जारी किए. गत सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि लंबे समय से राष्ट्रीय चुनाव आयोग के पास मामला लंबित है. समय रहते इस पर निर्णय होना चाहिए था. सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के साथ हुए पत्राचार की जानकारी भी अदालत के समक्ष रखी गई थी. जिसमें गति से इसके निपटारे को लेकर कोई खुलासा न कर, केवल नियमों के अनुसार कार्यवाही होने की जानकारी उजागर की गई थी. जिसके बाद अदालत ने इस संदर्भ में स्पष्टीकरण के साथ हलफनामा दायर करने के आदेश चुनाव आयोग को दिए थे. हलफनामा दायर करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने इसके लिए 8 सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया था. किंतु हाई कोर्ट ने अंतिम मौका प्रदान कर 2 सप्ताह में हलफनामा दायर करने के आदेश दिए. 

    कोर्ट का सख्त रवैया

    अदालत ने आदेश में स्पष्ट किया था कि यदि 2 सप्ताह के भीतर चुनाव आयोग की ओर से हलफनामा दायर नहीं किया गया तो अदालत सुनवाई शुरू कर अंतिम निर्णय दे देगी. याचिकाकर्ता की ओर से याचिका में बताया गया कि विधायक रवि राणा के चुनावी एजेंट सूर्यकांत दुधाने की ओर से ही चुनावी खर्च का लेखाजोखा दिया गया था. उसी लेखाजोखा में निर्धारित खर्च से अधिक खर्च होने का खुलासा हुआ था. जिसके बाद मामला उजागर होते ही राज्य के अतिरिक्त मुख्य चुनाव अधिकारी ने इसकी जानकारी भारत निर्वाचन आयोग के प्रधान सचिव को दी थी. यहां तक कि जिला चुनाव अधिकारी की ओर से मामले की हुई जांच की रिपोर्ट भी चुनाव आयोग को सौंपी गई थी. इसके बावजूद कार्रवाई नहीं की गई.